सोमवार, 28 जुलाई 2008

अध्याय 8 ::: प्रार्थनाओं के उत्तर

सभी प्रार्थनाओं के उत्तर होते हैं


जब प्रार्थनाओं के उत्तर होने की बात आती है तो आमतौर पर ये माना जाता है कि ये तो ईश्वर की मर्जी है कि वो प्रार्थना को सुने या ना सुने और उसका अधिकार है कि उसका उत्तर दे या न दे। इसमें परमेश्वर के अधिकार की बात तो ठीक है पर उपरोक्त कथन पूरी तरह से सत्य नहीं है क्योंकि परमेश्वर का एक स्वभाव है और वो उसके विपरीत कभी व्यवहार नहीं करता।

याद रखें कि वो पवित्र परमेश्वर है और कभी न तो झूठ बोलता है और न ही अपने वायदों से मुकरता है। वह इंसान की तरह नहीं है कि अपनी बात से बदल जाए।

बाइबल में परमेश्वर ने अपना स्वभाव व्यक्त किया है। आइए देखें कि वो इस बारे में क्या कहता है। यिर्मयाह कि पुस्तक 29:12 में ऐसा लिखा है –

तब उस समय तुम मुझ को पुकारोगे और आकर मुझ से प्रार्थना करोगे और मैं तुम्हारी सुनूँगा।

पुराने नियम (प्रभु यीशु के पृथ्वी पर मानव रूप में आने से पहले का विवरण) में किये अपने वायदों को परमेश्वर नये नियम (प्रभु यीशु के मानव रूप में आने का तथा उसके बाद का विवरण) में भी सिद्ध करता है। मत्ती तथा लूका रचित सुसमाचारों में ऐसा बताया गया है कि प्रभु यीशु ने कहा (मत्ती 7:7 तथा लूका 11:9) –

माँगो, तो तु्म्हे दिया जाएगा; ढूँढो तो तुम पाओगे; खटखटाओगे, तो तुम्हारे लिये खोला जाएगा।

और 11वीं आयत में भी कि –

“अतः जब तुम बुरे होकर, अपने बच्चों को अच्छी वस्तुएँ देना जानते हो, तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता अपने माँगनेवालों को अच्छी वस्तुएँ क्यों न देगा ?”

फिर मत्ती 18:19 में –

“फिर भी मैं तुम से कहता हूँ, यदि तुम में से दो जन पृथ्वी पर किसी बात के लिए एक मन होकर उसे माँगे, तो वह मेरे पिता की ओर से जो स्वर्ग में है, उनके लिए हो जाएगी।”

और मत्ती 21:22 में –

“और जो कुछ तुम प्रार्थना में विश्वास से माँगोगे वह सब तुम को मिलेगा”

मरकुस 11:24 में भी –

“इसलिए मैं तुम से कहता हूँ कि जो कुछ तुम प्रार्थना करके माँगो, तो विश्वास कर लो कि तुम्हे मिल गया, और तुम्हारे लिये हो जाएगा।”

युहन्ना के अध्याय 14 के 13 तथा 14 आयत में ज़ोर देते हुए कि –

“जो कुछ तुम मेरे नाम से माँगोगे, वही मैं करूँगा कि पुत्र के द्वारा पिता की महिमा हो। यदि तुम मुझ से मेरे नाम से कुछ माँगोगे, तो मैं उसे करूँगा।”

युहन्ना 16:24 में प्रभु यीशु ने फिर कहा –

“अब तक तुम ने मेरे नाम से कुछ नहीं माँगा; माँगो, तो पाओगे ताकि तुम्हारा आनन्द पूरा हो जाए।”

हमारा परमेश्वर अल्फ़ा (आदि) और ऑमेगा (अंत) है (प्रकाशितवाक्य 1:8), जो कभी नहीं बदलता परंतु कल, आज और कल एक सा रहता है (इब्रानियों 13:8), जो कि पवित्र है ( 1 पतरस 1:16, लैव्यव्यवस्था 11:44,45, 19:2 20:7) और सिद्ध है (व्यवस्थाविवरण 32:4, 2 शमुअल 22:31)। वो परमेश्वर जो सदियों से वायदे करता चला आ रहा है वो अपने चरित्र की अखण्डता के कारण अपने सभी वायदे पूरा करता है।

यदि हम प्रभु यीशु मसीह की प्रकृति, उनके स्वभाव तथा उनके चरित्र को जानते हैं तो हमें इस बात में कतई संदेह नहीं होगा कि परमेश्वर हरेक प्रार्थना का जवाब ज़रूर देता है। वक्त की ज़रूरत सिर्फ इतनी है कि हम उसके जवाब को सुनने के लिए अपने आत्मिक कानों को तैयार करें। जैसे हम रेडियो या टेलीविजन में अपनी पसंद के कार्यक्रम सुनने अथवा देखने के लिए सही आवृति (फ्रिक्वेंसी) पर चैनल लगाते हैं उसी प्रकार हमें अपने मन-मस्तिष्क को सही जगह लगाना पड़ता है ताकि परमेश्वर की मीठी महीन आवाज़ को सुन सकें।

यदि हमारी प्रार्थना सुनी नहीं जाती है या हम अपनी प्रार्थनाओं के जवाब नहीं पाते हैं तो इसके दोषी हम स्वयं हैं, परमेश्वर नहीं। मैंने कई लोगों को ईश्वर पर दोष लगाते देखा है जबकि गलती हमारी ही होती है। सच में यह परमेश्वर की लापरवाही नहीं है बल्कि हमारा अविश्वास या गलत चीजों में (या गलत जगह पर) विश्वास है।

परमेश्वर के वायदों को अपने जीवन में पूरा करने के लिए हमें कुछ शर्तों को पूरा करना पड़ता है। अपनी प्रार्थनाओं के उत्तर पाने की शर्तें ये हैं कि हम परमेश्वर के मार्ग पर चलने वाले हों, उसके वचन में जड़ जमाए हों, उसकी जीवित आवाज़ को सुनने और मानने वाले हों, पापरहित जीवन बिताते हों तथा उसकी मर्ज़ी पूरी करते हों। यदि हमसे कमजोरी में या अनजाने में पाप हो भी जाए तो उससे पश्चाताप कर आगे का जीवन परमेश्वर के भय में बिताना ज़रूरी है।

बाइबल में यशायाह 59:1,2 में लिखा है –

“सुनो, यहोवा (परमेश्वर) का हाथ ऐसा छोटा नहीं हो गया कि उद्धार न कर सके, न वह ऐसा बहिरा हो गया है कि सुन न सके; परन्तु तुम्हारे अधर्म के कामों ने तुम को तुम्हारे परमेश्वर से अलग कर दिया है, और तुम्हारे पापों के कारण उसका मुँह तुम से ऐसा छिपा है कि वह नहीं सुनता”

और युहन्ना 15:7 में –

“यदि तुम मुझ में बने रहो और मेरा वचन तुम में बना रहे, तो जो चाहो माँगो और वह तुम्हारे लिये हो जाएगा।”

जब हम प्रार्थना करते हैं तो हमें यह विश्वास रखना बहुत ज़रूरी है कि जिससे हम प्रार्थना कर रहे हैं वह परमेश्वर जीवित तथा भरोसेमंद है और अपने वायदों को पूरा करता है। प्रार्थना के समय हमें पूरा विश्वास करना चाहिए (और संदेह नहीं होना चाहिए) कि वो इसका उत्तर ज़रूर देगा, यहाँ तक की प्रार्थना करने के तुरंत बाद यदि हमें पूरा विश्वास है तो हम परमेश्वर का धन्यवाद कर सकते हैं कि उसने प्रार्थना को सुन लिया और उसका उत्तर दे दिया है। इसके अलावा और भी बहुत सी बातें मैं लिख सकता हूँ पर यदि हम परमेश्वर से प्रेम करते हैं और उसका भय मानते हैं तो वो काफ़ी है क्योंकि इन के होते हम अपने मन, प्राण तथा आत्मा से आज्ञाकारिता का जीवन बिताते हैं।

ये सभी बातें मैंने अपने आत्मिक जीवन में धीरे-धीरे सीखीं जैसे जैसे मैं पवित्र आत्मा के चलाए जीवन जीता रहा। हालांकि शुरूआत में तो मुझे ज्ञान की बहुत सी बातें नहीं पता थीं पर परमेश्वर द्वारा दिया नया जीवन, बच्चों जैसा सरल विश्वास, प्रार्थना करने का तथा उत्तर पाने का उत्साह और उसके वचन की भूख थी जो मुझे सदा परमेश्वर के साथ रखती थीं और मेरी प्रार्थनाओं के जवाब दिलाती थीं। और मैं आज भी ये मानता हूँ कि परमेश्वर के साथ जीवन बिताने के प्रेम ही काफी हैं, ज्ञान की कोई प्रधानता नहीं है।

मैंने सीखा कि परमेश्वर अलग अलग तरीकों से हमसे बात करता है। कभी परिस्थितियों के द्वारा, कभी हमारी प्रार्थना में मांगी गई वस्तु देकर, कभी अपने दासों के द्वारा तो कभी अपनी मीठी आवाज से जो हमारे मन में आती है और विश्वास के द्वारा हम उसे सुनते हैं।

यदि हम सटीक प्रार्थना करते हैं तो हमें सटीक जवाब भी मिलता है। परंतु यदि हम बात को गोल गोल घुमाकर प्रार्थना करते हैं तो या तो उसका जवाब ही नहीं मिलता और यदि मिल भी जाए तो हम इसे समझ नहीं पाते। सटीक प्रार्थना के लिए हमें परमेश्वर के विश्वास की ज़रूरत पड़ती है।


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परमेश्वर से प्रार्थना के जवाब कैसे पाएँ


यह एक बहुत महत्वपूर्ण सिद्धान्त है जो मैंने बाइबल से सीखा है और मैं आपके साथ बांटना चाहता हूँ। बाइबल अनेक वायदों से भरपूर है। परमेश्वर के वायदे खज़ाने की चाबी की तरह हैं जो कि हमें दे दी गई है।

जब भी हम बाईबल में एक वायदा पाएँ, हमें तब तक प्रार्थना करना चाहिए जब तक पवित्र आत्मा हमारे मन में सम्पूर्ण विश्वास न भर दे और हमें ऐसा लगने न लगे कि यह वायदा हमारे ही लिए है। अगर वायदा किसी शर्त के साथ हो तो पहले आप इस शर्त को पूरा करें और फिर प्रार्थना करें; परन्तु यदि यह वायदा बिना किसी शर्त के दिया गया हो तो तुरंत विश्वास के द्वारा अपनी प्रार्थना का उत्तर प्राप्त करना चाहिए तथा यह मान लेना चाहिए कि सही समय में परमेश्वर इसे पूरा करेंगे और फिर हमें प्रार्थना के जवाब के लिए परमेश्वर का आभार प्रकट करना चाहिए। परमेश्वर अपने समय में आपको आशीष ज़रूर देंगे। हमें तब तक प्रार्थना करनी चाहिए जब तक परमेश्वर की आश्वासन न आ जाए कि प्रार्थना सुन ली गई है। मैं आपसे कह सकता हूँ कि ज्यादा समय नहीं बीतेगा कि आप परमेश्वर के वायदे को अपने जीवन में पूरा होते देखेंगे।


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गवाहियां


प्रभु यीशु में विश्वास करने के बाद धीरे धीरे मैंने ऊपर लिखा सिद्धान्त सीखा। मैं शुरू से लेकर अब तक परमेश्वर की विश्वासयोग्यता से अचम्भित होता रहा हूँ।

यूँ तो हमारा जीवन प्रभु के सभी विश्वासियों की तरह अनगिनत आशीषों से और गवाहियों से भरा हुआ है, परन्तु मैं यहाँ सब बातों का उल्लेख नहीं कर रहा हूँ। मैं आपको उत्साहित करने के लिए और यह दिखाने के लिए कि परमेश्वर कितना महान है और प्रार्थनाओं के उत्तर देने वाला भला परमेश्वर है, कुछ बातें यहाँ लिख रहा हूँ जो कि मेरी याददाश्त में बिलकुल साफ साफ अंकित हैं।

हरेक प्रार्थना के उत्तर के साथ परमेश्वर ने हमें कुछ सिखाया है जिससे हमारा विश्वास बढ़ता चला गया है और प्रभु यीशु हमें उस दिन के लिए तैयार कर रहे हैं जब वो फिर से आने वाले हैं।


असफलताओं का सफलता में बदलना

मुझे जहाँ तक याद है, मैं पढ़ाई में कभी भी बहुत तेज नहीं था। बल्कि खेलकूद में ही मेरा मन ज्यादा लगता था। ऐसे खेल जिनमें शारीरिक व्यायाम ज़्यादा होता है वे मुझे पसंद थे जैसे कुश्ती, फुटबॉल तथा क्रिकेट।

गणित और विज्ञान से तो मेरा हमेंशा से छत्तीस का आंकड़ा रहता था। नवीं कक्षा तक तो मैं साठ प्रतिशत (60%) अंक लेकर पास हो ही जाता था परंतु 10वीं कक्षा के अर्ध-वार्षिक परीक्षाओं में मेरी भद्द पिट गई क्योंकि मेरे 100 में से सिर्फ 3 ही अंक आए।

पढ़ाई के लिये ठीक वातावरण न मिलने के कारण ऐसा हुआ था। मैं स्कूल से भागकर फिल्में देखने लगा और पढ़ाई से मुझे डर लगने लगा था। दसवीं की बोर्ड परीक्षा में मेरे बहुत बुरे अंक आये। गणित में तो मैं फेल ही हो गया था जिसके लिए मैंने फिर से इसका पर्चा लिखा और 47% लेकर पास हुआ। बड़ी मुश्किल से मैं द्वितीय श्रेणी से दसवीं में पास हुआ।
आगे की पढ़ाई के लिए मैं विज्ञान नहीं चुनना चाहता था पर पापा ने कहा कि यदि वे विषय मेरी बस में न हों तो मैं न लूं। यह बात मुझे चुभ गई और मैंने विज्ञान के ही विषय लेना तय किया चाहे आगे कुछ भी क्यों न हो।

केन्द्रीय विद्यालय में तो मुझे यह विषय नहीं मिल रहे थे तो मैंने पौद्दार विद्यालय में जाने का निर्णय लिया। यह सिर्फ लड़कों का स्कूल था और यहाँ के छात्रों के लिए दुनियाभर की सारी शरारतों के बाद ही पढ़ाई का स्थान आता था। मैंने वहाँ कई मित्र बना लिए और कई नई गलत बातें सीखीं। मैं अपने दोस्तों के साथ सिगरेट पीने लगा (शायद मेरे परिवार के लोग आज तक भी ये बात न जानते हों), सप्ताह में एक या ज्यादा बार फिल्में देखने लगा, घर के बजाय हॉटलों में खाना खाने लगा, लड़कियों को छेड़ने लगा और लड़ाई-झगड़ा करना मेरे लिए आदत सी बन गई।

इन सब बातों के चलते, 11वीं कक्षा में मुझे सप्लीमेंटरी आ गई। गिरते पड़ते मैं उसमें पास हो गया पर 12वीं में तो मैं फेल ही हो गया। 12वीं की परीक्षा मैंने दोबारा दी और 47% अंकों से पास हुआ।

मेरी योग्यता से नहीं पर आरक्षण के चलते जयपुर के सबसे अच्छे विज्ञान कॉलेज (महाराजा कॉलेज) में मेरा दाखिला हो गया। मैंने भौतिकी, भूविज्ञान तथा गणित विषय लिए। अजीब बात ये थी कि जिन विषयों से मुझे डर लगता था वो ही मेरी नियति बन गए थे।

प्रथम वर्ष में मेरे 55% अंक ही आये।

द्वितीय वर्ष में मैं कॉलेज के चुनावों में खड़ा हो गया। कई दोस्तों के चढ़ाने पर मैंने यह निर्णय लिया था और मैं भी सोचता था कि इसी से मेरी कुछ तो पहचान बनेगी। चुनाव तो मैं हार ही गया पढ़ाई में भी मेरी नुकसान हुआ। इस साल मेरे सिर्फ 45% अंक ही आए।

हालांकि मैं आत्मनिर्भर होने की सोचा करता था ताकि अपनी मम्मी तथा भाई-बहन को खुश रख सकूँ परंतु इस दिशा में मैं अब तक कुछ भी नहीं कर रहा था। परंतु तीसरे वर्ष में प्रभु यीशु मेरे जीवन में आये और उसके बाद मेरा जीवन बिल्कुल बदल गया।

मैंने सही या गलत, सभी कारणों से लड़ाई-झगड़ा करना बंद कर दिया। सभी लड़कियों को मैं बहन की तरह देखने लगा, मैंने सिगरेट पीना बिलकुल छोड़ दिया, मेरा दिमाग भी जैसे बदल सा गया था। मैं अपने जीवन के तथा परिवार के प्रति जिम्मेदारी महसूस करने लगा था।

जैसे कोई अंधेरे कमरे में दीया जलाता है ठीक उसी प्रकार मेरे जीवन के अंधकार में परमेश्वर की ज्योति आ गई थी। तीसरे वर्ष में पहली बार मुझे 74% अंक मिले। यह मेरे जैसे विद्यार्थी के लिए एक चमत्कार से कम नहीं था। परमेश्वर ने मेरे लिये यह किया था।

राजस्थान विश्वविद्यालय के कम्प्यूटर डिप्लोमा की भर्ती परीक्षा में मैं प्रभु की दया से मैं आरक्षित सीटों में प्रथम स्थान पर आया था। यह भी एक आश्चर्यकर्म ही था।

प्रभु यीशु को जानने से पहले मैं नकल करने में उस्ताद था और परीक्षा से पहले अपना ज्यादा समय पर्चियां बनाने में निकालता था ताकि परीक्षाओं में उत्तर लिख सकूँ। परमेश्वर को जानने के बाद ये आदत कहाँ चली गई ये मुझे भी नहीं पता और न ही कभी ऐसी इच्छा या ज़रूरत मुझे कभी महसूस हुई।

मुझे भारत के सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों में से एक, आई.आई.टी. (रूड़की) में उच्च शिक्षा के लिये दाखिला मिल गया। ये गवाही वृतांत में मैं आगे बताऊँगा। रूड़की में अपने आखिरी प्रोजेक्ट में मैं 92% अंक पा सका और अपने शिक्षकों तथा गाइड से मुझे काफी सराहना मिली।

आगे नौकरी में भी परमेश्वर की बड़ी करूणा हम पर बनी रही और मैं ऊँचा उठता चला गया।

मेरी असफलताएँ गायब हो गईं और सफलताएँ एक एक कर मेरे पास आने लगी। परमेश्वर का अनुग्रह निरंतर मेरे साथ रहा और पढ़ाई, नौकरी, पारिवारिक तथा व्यक्तिगत जीवन की सभी परिस्थितियों में परमेश्वर ने मुझे सही निर्णय लेने में मेरी सहायता की। मैं सच में परमेश्वर का तहे-दिल से शुक्रगुज़ारी करता हूँ।


तीन राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाएँ पास कीं –
जो मनुष्य के लिए असंभव है वो ईश्वर के लिए संभव है


स्नातक पढ़ाई के आखिरी वर्ष में (1997-1998), मुझे दो बातों में से एक बात का चुनाव करना था – या तो मैं कोई नौकरी करूँ या किसी अच्छे संस्थान में उच्च शिक्षा के लिए दाखिला लूँ।

पापा चाहते थे कि मैं एक प्रशासनिक अधिकारी बनूं या फिर किसी प्रतिष्ठित जगह पर उच्च तकनीकी शिक्षा लूं। वो इस बारे में सारी जानकारियां भी इकट्ठी करके रखते थे। उनको शौक था कि वो सलाह दें। वो न सिर्फ हमारा मार्गदर्शन करते थे बल्कि उन सभी को भी उत्साहित करते थे जो उनसे राय लेने आते थे और उनको सब प्रकार की जानकारी देते थे।

मैं कॉलेज की पढ़ाई के बाद कम्प्यूटर (मास्टर ऑफ कम्प्यूटर एप्लीकेशंस) की पढ़ाई करना चाहता था और मैंने इसी के लिए तैयारी भी करना शुरू कर दिया था। पापा ने ज़ोर देकर बहुत सी जगहों पर अलग अलग विषयों के लिये फार्म भरवाए। मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय, बड़ोदा (वडोदरा) विश्वविद्यालय, रूड़की विश्वविद्यालय तथा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के फार्म भर दिए। भूविज्ञान की उच्च शिक्षा के लिए जाने की मेरी कोई इच्छा ही नहीं थी फिर भी पापा के कहने पर मैंने रूड़की में भूविज्ञान में एम. टैक. के लिए भी फार्म भर दिया था।

हमारी तैयारी में ज़्यादातर पापा के शराब पीकर आने से विध्न पड़ जाता था। वो अगर इसे बंद नहीं कर सकते तो कम से कम मात्रा तो घटा सकते थे – यह विचार हमारे मन में आता था। कई बार मुझे अपने दोस्तों के सामने पापा की इस आदत के कारण शर्मिंदा होना पड़ता था। न तो मैं अपने दोस्तों को अपने घर बुला सकता था और न ही तैयारी करने उनके घर जा सकता था क्योंकि फिर मुझे घर की चिंता सताती रहती।

रश्मि के सामने भी पापा ने कई बार घर में तमाशा किया पर सिर्फ ये एक ऐसी दोस्त थी जिसके सामने मुझे शर्म नहीं आती थी। वो हमारे परिवार का एक भाग सी हो गई थी और हरेक बात में मुझे समझाती थी कि यह पापा की गलती नहीं है बल्कि शैतान उनके पीछे से हमको नाश करने की कोशिश करता है। वो मेरे साथ इस विषय में प्रार्थना भी किया करती थी।

उन महत्वपूर्ण दिनों में एक दिन पापा बहुत शराब पीकर घर लौटे और फिर आगे दो-तीन दिन तक लगातार पीते रहे। आखिरकार मैंने उनको रोकने की चेष्ठा की और यह बात मुझे बहुत भारी पड़ी। वो बहुत गुस्सा हो गये। उन्होंने बड़े स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि मैं पहले ज़िन्दगी में कुछ करके दिखाऊं और फिर उनसे बात करूँ अथवा नहीं।

उन्होंने कहा," मुझे कुछ बताने की और समझाने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई, तुम्हारी औकात अभी क्या है? तुम कीड़े के समान हो। कीड़े-मकोड़े रोज़ पैदा होते हैं और मर जाते हैं। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता यदि तुम कहीं जाकर मर जाओ।" उन्होंने मुझे कहा कि मैं उनके घर से निकल जाऊँ या अपने आप को सिद्ध करके दिखाऊँ। और यह भी, “जाओ और तीनों परीक्षाओं में पास होकर दिखाओ वर्ना मुझसे कभी ऐसी बात मत करना”।

मुझे बहुत दुःख हुआ और मैं परमेश्वर के सामने बहुत रोया। इस पूरे वाकये में एक ही खुशी की बात मुझे नज़र आ रही थी, वो ये कि पापा ने कहा कि अगर मैं तीनों परीक्षाएँ जो अभी बची थीं, उनमें पास होकर दिखा दूँ तो वो शराब पीना छोड़ देंगे। फिर भी दुनियावी तरीके से मेरे पास कोई आशा नहीं थी क्योंकि तीनों ही परीक्षाएँ बड़ी प्रतिष्ठित संस्थानों की थीं और मेरे लिए इन सबमें एकसाथ पास हो पाना बहुत मुश्किल था।

मुझे तीन राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं में बैठना था और मुझे मालूम नहीं था कि मैं कैसे पास होउंगा क्योंकि ये मेरे लिए ऐसा था जैसे किसी ने मुझे अभियांत्रिकी (इंजीनियरिंग) और चिकित्सा विज्ञान (मेडीकल साइंस) दोनों के प्रवेश परीक्षा में पास होने के लिए कहा हो, जो नामुमकिन तो नहीं पर बहुत ही दुष्कर है।

मैं इस प्रकार प्रार्थना करता था –

“प्रिय प्रभु यीशु, मैं जानता हूँ कि अपनी बुद्धि, सामर्थ और मेहनत से मैं इन तीनो परीक्षाओं में पास नहीं हो सकता। मैं सिर्फ MCA के लिए ही तैयारी कर रहा हूँ और मेरे पास तो भूगर्भ-विज्ञान (रूड़की) की तैयारी करने का समय भी नहीं है। प्रभु, इस स्वर्ग और पृथ्वी के रचनाकार तो आप ही हैं, आपको सबकुछ मालूम है, आप मुझे सब कुछ सिखा सकते हैं। कृपया तैयारी करने में और तीनों परीक्षाओं को पास करने में मेरी सहायता कीजिए। आमीन।”

मेरे पास तैयारी करने के लिए बहुत ही कम समय था। लोग साल साल भर तैयारी करते हैं कि रूड़की में प्रवेश पा सकें, मैं 20-25 दिन में क्या कर सकता था। जो मेरे बस में था मैंने किया और बाकि सब प्रभु पर विश्वास करके छोड़ दिया था।

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की तथा रूड़की की प्रवेश परीक्षा देने के बाद मैं वडोदरा चला गया। मेरे पास एक अटूट आशा थी कि परमेश्वर ने मेरी दुआ सुन ली है और वो उसका जवाब ज़रूर देंगे। आखिरी परीक्षा का परिणाम आ गया और मैं वडोदरा के महाराजा सायाजीराव विश्वविद्यालय का छात्र हो गया।

कुछ दिनों के पश्चात मम्मी ने फोन किया और मुझे अपना टिकट बनाने के लिए कहा। उन्होंने बताया कि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (MCA) की परीक्षा का परिणाम आ गया और मैं पास हो गया था और मुझे वहाँ अपनी अंक-तालिका (मार्क-शीट) जमा करनी थी। उन दिनों राजस्थान विश्वविद्यालय में हड़ताल चल रही थी और इस कारण हमारी अंक-तालिका नहीं आई थी। मुझे व्यक्तिगत रूप में जाकर कार्यालय में उसकी प्रति मांगनी थी।

दूसरे दिन फिर मम्मी का फोन आया और उन्होंने मुझे जल्दी आने के लिए कहा। उन्होंने फिर बताया कि बनारस जाने से पहले मुझे रूड़की भी जाना था क्योंकि मैं उसमें भी पास हो गया था।

मेरी आंखों में आंसू आ गये और मेरा गला भर आया। मैं आगे कुछ नहीं बोल पाया पर रोते रोते मैं प्रभु का धन्यवाद करता रहा। उसकी करूणा ने मेरे लिए असंभव को संभव कर दिया था।

मैं परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ कि उसने मुझे लज्जित नहीं होने दिया। उसने अपना वायदा पूरा किया और मुझे पूँछ नहीं पर सिर ठहराया। प्रभु की स्तुति हो।


गणित के एक प्रश्न का हल –
आवश्यकता के समय विद्यमान मदद


मैं स्नातक पढ़ाई के तीसरे वर्ष में अंकगणित का एक पर्चा देने के लिए परीक्षा हॉल में बैठा था। अपनी नई आदत के अनुसार मैं प्रार्थना करने लगा ताकि प्रश्न मेरे लिए आसान हों तथा परमेश्वर के बुद्धि और ज्ञान से मैं पर्चा लिख सकूँ।

थोड़ी देर में पर्चा मेरे हाथ में आ गया। हमारे प्रश्नपत्र में तीन भाग हुआ करते थे जिनमें तीन-तीन प्रश्न होते थे। हरेक भाग से कम से कम एक प्रश्न लेते हुए हमें कुल पाँच प्रश्न हल करने होते थे। पहले भाग से सवाल न हल करने की दशा में हमारी कॉपी की जाँच न होने की भी संभावना थी।

मुझे दूसरे और तीसरे भाग के सभी प्रश्न आते थे पर पहले भाग से एक भी प्रश्न का हल नहीं आ रहा था। मुझे डर लगा कि ऐसे तो मैं फेल ही हो जाऊँगा। अब मुझे अपनी काबलियत पर कोई भरोसा नहीं रहा। मैंने अपने पेन-पेपर नीचे रखकर प्रार्थना करना शुरू कर दिया।

प्रार्थना के तुरंत बाद जो भी मेरे दिमाग में आने लगा, मैं उसे जल्दी जल्दी लिखने लगा। इस प्रकार पहले भाग से एक प्रश्न करने के बाद मैंने बाकी का पर्चा हल किया और घर भागा। घर पहुंचते ही मैंने किताब खोलकर देखा तो पाया कि जो प्रश्न मुझे नहीं आता था और जिसका जवाब मैंने परमेश्वर से पाया था वो एकदम वैसा ही था जैसा किताब में लिखा था।

बाइबल में याकूब 1:5 में लिखा है –

“पर यदि तुम में से किसी को बुद्धि की घटी हो तो परमेश्वर से माँगे, जो बिना उलाहना दिए सबको उदारता से देता है, और उसको भी दी जाएगी।”

परमेश्वर ने अपना ये वायदा भी पूरा किया। मैं परमेश्वर की निरंतर उपस्थिति के लिए और तुरंत प्रार्थना के उत्तर के लिए उसका सदा धन्यवाद करता रहता हूँ।


रूड़की में चर्च का मिलना –
अनपेक्षित जगह में प्रार्थना के उत्तर मिलना


कॉलेज की पढ़ाई के बाद, परमेश्वर ने अपनी मर्जी मेरे जीवन में पूरी की और बाकी सब द्वार बंद कर सिर्फ रूड़की का द्वार खुला रखा। मैंने भूविज्ञान (एप्लाइड जियोलॉजी) के एम. टेक. प्रोग्राम में प्रवेश ले लिया। पापा मुझे वहां छोड़ने गये थे, यह उनके लिए एक ऐसे स्वप्न के समान था जो पूरा हो गया था।

वहाँ जाने के बाद बहुत समय तक मुझे कोई चर्च नहीं मिला। मेरी गिदौन बाइबल ही मुझे हर दिन परमेश्वर के बारे में सिखाती थी और मेरा उत्साहवर्धन करती रहती थी। मैं रोज इसमें से पढ़ता था और प्रार्थना किया करता था। मैं जयपुर फोन करके पास्टर पीटर से भी आग्रह करता था कि वो मेरे लिए एक चर्च ढूंढे।

मेरे एक सहपाठी (और बहुत अच्छे मित्र) लेखराज के साथ, जो मेरे साथ गंगा भवन (छात्रावास) में रहता था, मुझे परमेश्वर के प्रेम का सुसमाचार बांटने का मौका मिला। कभी कभी मैं उसके साथ प्रार्थना करने के लिए उसके कमरे में चला जाता था।

एक दिन जब मैं उसके कमरे में बैठा था और वो अपना कमरा साफ कर रहा था; तभी एकाएक परमेश्वर ने जैसे मुझे उस कचरे में से कुछ उठाने के लिए प्रेरित किया। आमतौर पर हम ऐसा नहीं करते पर पता नहीं क्यों मैंने तुरंत उस कचरे में से, जो वो झाड़ू से निकाल रहा था, एक मुड़ा-तुड़ा कागज़ उठा लिया। वो एक मसीही प्रचार का कागज़ था जिसमें कलीसिया का पता तथा एक आमंत्रण संदेश लिखा था। तब से लेकर जब तक हम रूड़की में रहे, हम (मैं और प्रेरणा) उसी चर्च में संगति करते रहे। पास्टर लांस का यह चर्च हमारे जीवन में एक अलग स्थान रखता है। यही वो जगह थी जहाँ प्रेरणा ने उद्धार पाया और हम साथ में विश्वास में बढ़े।

परमेश्वर ने एक ऐसी जगह पर मुझे मेरी प्रार्थना का उत्तर दिया जहाँ मैं कतई भी इसकी उम्मीद नहीं कर रहा था। इससे परमेश्वर ने सिखाया कि जब हम प्रार्थना करते हैं तो इसका जवाब पाने के लिए हमेंशा सब जगह तैयार रहना चाहिए क्योंकि परमेश्वर अनपेक्षित जगहों पर भी प्रार्थना का जवाब दे सकता है।


मेरे बैग का खोना और पाना –
परमेश्वर पर विश्वास कर शांति के साथ आगे बढ़ना


यदि हम बच्चों जैसे सरल विश्वास के साथ बिना संदेह के प्रार्थना करें तो हम हरेक प्रार्थना का जवाब पा सकते हैं। परमेश्वर ने ऐसा आश्वासन बाइबल में दिया है ।

रूड़की की पढ़ाई के दौरान सर्दियों की छुट्टियों में मैंने घर जाने की योजना बनाई। जब मैं तैयारी कर रह था तो मुझे पता चला कि देहरादून में एक 3 दिन की मसीही सभा होने वाली थी। मैंने सोचा कि मैं पहले इसमें जाऊँगा और फिर सीधा जयपुर चला जाऊंगा।

वहाँ जाने का अनुभव बड़ा ही अच्छा रहा। हर दिन की शुरूआत प्रार्थना, आराधना तथा बाइबल वचन से होती थी। उसके बाद पूरे दिन में 2 या 3 प्रचार होते थे, दिन में अलग अलग गुट बनाकर कुछ आत्मिक विषयों पर विचार-विमर्श होता था। इन तीन दिनों में हम विश्वास से और वचन से लबालब भर गये थे।

सभा का समापन होने के बाद मैं दिल्ली जाने के लिए मैं देहरादून से एक बस में बैठा। दिल्ली जाने का रास्ता रूड़की से होकर गुज़रता था। बस जैसे ही रूड़की में रुकी, मैं थोड़ा तरोताज़ा होने के लिए और पानी की बोतल खरीदने के लिये नीचे उतर गया। भारी भीड़ के कारण बस तक पहुँचने में मुझे थोड़ी देर हो गई और मेरी बस छूट गई।

मैंने इस परिस्थिति को भी बड़े आराम से लिया, मैं बदहवास नहीं हुआ। बल्कि मैंने परमेश्वर का धन्यवाद किया क्योंकि मैं जानता था कि सब बातें उसके नियंत्रण में थीं। मैने विश्वास किया कि प्रभु मुझे मदद करेंगे कि मैं ‘चीतल ग्रांड’ (मिड-वे जहाँ बस थोड़ी देर के लिये रुकती थी) पर अपनी बस वापस पकड़ सकूँ।

थोड़ी देर के इंतज़ार के बाद मुझे एक स्थानीय बस मिली और मैं उसमें बैठ गया। यह बस रोडवेज बस की तुलना में बहुत धीरे चल रही थी, फिर भी मेरा विश्वास मुझे परमेश्वर की काबलियत पर संदेह नहीं करने दे रहा था।

बस में जो व्यक्ति मेरे पास बैठा था उसने मुझे गीत गाते देखा और समझा कि मैं बहुत खुश था। उसने मुझसे इसका कारण पूछा तो मैंने उसे परमेश्वर के प्रेम के बारे में बताया जो मुझे हरेक परिस्थिति में आनंद देता है। फिर उसने पूछा कि मैं कहाँ जा रहा था। मैंने उसे सारी बात बताई कि किस तरह मेरी बस छू़ट गई और मैं उसे चीतल ग्रांड पर पाने की अपेक्षा कर रहा था। उस भाई को बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि जिस बस में हम बैठे थे वो तो बहुत धीरे चल रही थी और रोडवेज बस को इससे पकड़ पाना नामुमकिन सा था। मैंने उससे कहा कि परमेश्वर के लिए कुछ भी मुश्किल नहीं है और वो बस को एक घण्टे तक भी रोके रह सकता है।

मैं चीतल ग्रांड पर इस बस से उतरकर मिडवे के बस-स्टैंड की ओर लपका जहाँ मेरी बस खड़ी थी। झट से मैं उसमें चढ़ गया और देखा कि सारे यात्री पहले से बैठे थे और ड्राईवर के पिछले आधे घण्टे से न आने के कारण भिनभिना रहे थे। मैंने अपना सामान अपनी सीट पर सुरक्षित पाया। जल्दी ही ड्राइवर भी आ गया और हम चल पड़े।

इस घटना के द्वारा भी परमेश्वर ने सिखाया कि वो हमेंशा हर स्थिति को अपने नियंत्रण में रखता है। अपने विश्वासियों पर वो करूणा करता है, हमें हर छोटी और बड़ी परिस्थिति में सिर्फ उसपर भरोसा करने की ज़रूरत है। इस बात से परमेश्वर ने मेरे विश्वास को बहुत बढ़ाया।


हमारी पहली नौकरी –
अनदेखे को देखना परमेश्वर ने सिखाया


मैं और प्रेरणा दोनों सहपाठी भी थे और साथी विश्वासी भी। हमारी परमेश्वर पर निर्भरता बढ़ती जा रही थी और परमेश्वर भी हमारी प्रार्थनाओं के उत्तर देकर हमारे विश्वास को बढ़ाता जा रहा था।

हम दोनों को ही नौकरी की सख्त ज़रुरत थी ताकि अपने अपने परिवारों की ज़िम्मेदारी उठा सकें। हमने यह विनती परमेश्वर के चरणों में रख दी और हर दिन इस बात के लिए दुआ करते रहे।

पॉल योंगी चो कि एक किताब ‘विश्वास की अद्भुत रेखा’ पढ़ने से हमने बाइबल का प्रार्थना के विषय में एक सिद्धान्त सीखा था और इसलिए न सिर्फ हमने इस बात पर विश्वास किया कि हमें नौकरी मिल चुकी है बल्कि हमने इस बात को सबके सामने बोलना भी शुरू कर दिया।

“अब विश्वास आशा की हुई वस्तुओं का निश्चय, और अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण है।”

[इब्रानियों 11:1]

मुझे लगता था कि हमारी नौकरी NIIT (इसरी इंडिया) कम्पनी में ही लगेगी। मैं कई बार ऐसा बोल भी देता था। जब हम बोलते थे कि हमें तो नौकरी मिल चुकी है तो हमारे कई मित्र और सहपाठी इस बात पर हमारा मज़ाक भी उड़ाते थे। वे तरह तरह के सवाल करते थे; कोई पूछता कि क्या हमने कोई घूस खिलाई थी, तो कोई ये कि क्या हमारी बड़ी पहुँच थी। हमारे पास इन सब बातों का कोई जवाब नहीं था क्योंकि हम तो बस विश्वास के द्वारा ही ऐसा बोलते थे।

कई लोग हमें हतोत्साहित करने की कोशिश करते। वे कहते थे कि NIIT कम्पनी कैम्पस इंटरव्यू (साक्षात्कार) के लिए आएगी ही नहीं, और अगर आ भी गई तो भूविज्ञान के छात्रों को परीक्षा में बैठने की अनुमति नहीं देगी। और यह भी हो गया तौभी कक्षा के सबसे होनहार तथा उत्तम छात्रों का ही चयन करेगी। हम फिसड्डी तो नहीं थे पर अव्वल भी नहीं थे।

अन्ततः वो दिन आया जब परिसर में हो रहे इंटरव्यू के खत्म होने से एक दिन पहले NIIT आई। अपनी एक घोषणा में उन्होंने यह बता दिया कि ये भूविज्ञान के छात्रों के लिए भी खुली थी। उन्होंने फिर बताया कि वे तीन तरह की परीक्षा लेने वाले थे। हमें तीसरी परीक्षा GIS (भौगोलिक सूचना प्रणाली) के विषय में कुछ नहीं मालूम था।

हमने प्रार्थना करना शुरू कर दिया कि बाकी सभी टेस्ट में तो हम पास हो सकें पर तीसरी टेस्ट हो ही नहीं। दो परीक्षाओं के खत्म होते ही तुरंत हम पास्टर के पास गए और उनसे कहा कि हमारे लिए दुआ करें ताकि तीसरी परीक्षा न हो। उन्होंने हमें समझाया कि कम्पनी जब तैयारी के साथ आई है तो बेहतर है कि हम प्रार्थना करें कि हम उसमें पास हो जाएँ। पर हमने फिर भी कहा कि हमें इसकी परिभाषा के अलावा कुछ भी नहीं आता। पास्टर ने हमारे विश्वास को देखते हुए हर्षित मन से दुआ की कि GIS की परीक्षा न हो।

वापस आकर हमने देखा कि प्रभु की दया से हम पहली दो परीक्षाओं में पास हो गए थे। थोड़ी देर में कम्पनी के एक मैंनेजर ने आकर कहा कि समय के अभाव के कारण वे GIS की परीक्षा नही ले पाएँगे।

हमें विश्वास हो गया कि परमेश्वर हमारे साथ था।

साक्षात्कार शाम 7:30 बजे शुरू हुए। युवतियों को पहले बुलाया गया। प्रेरणा और मैं टहल टहलकर निरंतर परमेश्वर से प्रार्थना करते रहे। कई दोस्त आकर पूछते थे कि ये पढ़ा या वो पढ़ा, और हम कह देते थे कि जो नहीं पढ़ा वो हम अब नहीं पढ़ सकते और फिर हम दुआ में लगे रहते।

प्रेरणा ने कहा कि 35-40 मिनट का साक्षात्कार दे पाना उसके लिए बहुत मुश्किल था और ये भी कि उसे जी.आई.एस. के बारे में ज्यादा मालूम भी नहीं था। हमने प्रार्थना की कि उसका इंटरव्यू 15 मिनट से ज्यादा न हो और कोई तकनीकी सवाल भी उससे न पूछा जाए। जब उसका नम्बर आया तो 15 मिनट से कम समय में वो बाहर आ गई और उसने बताया कि उससे कोई तकनीकी सवाल भी नहीं पूछा गया। हमने फिर परमेश्वर का धन्यवाद किया। उसके बाद जब वो वापस हॉस्टल जाने लगी तो मैंने उससे कहा कि मेरे लिए दुआ करती रहे।

रात में 1:30 बजे मेरा नम्बर आया। मैं 10-11 मिनट में ही वापस आ गया। मुझसे भी कोई गम्भीर तकनीकी सवाल नहीं पूछे गये। मेरे बाद में मेरे ही एक मित्र देवेन्द्र का नम्बर था जो कि 5 मिनट में ही बाहर आ गया।

कई लड़के बहुत नाराज़ हो रहे थे और कम्पनी को गालीयाँ दे रहे थे। उन्हें लग रहा था कि बाद में कम्पनी ने सिर्फ खानापूर्ति की थी, और जिन्हे वो लेना चाहते थे उन्हें पहले ही से चुन लिया था। मुझे बड़ी शान्ति के साथ चलते देख उनमें से किसी ने मुझसे पूछा कि क्या मुझे गुस्सा नहीं आ रहा था। मैंने उनसे कह दिया कि कम्पनी कम से कम 2 जनों को तो लेकर ही जाएगी, प्रेरणा और बृजेश; तो मैं गुस्सा क्यों करूँ। शायद उन्होंने सोचा कि मेरा दिमाग खराब है।

उनमें से कुछ तो हमारे विश्वास के बारे में जानते भी थे फिर भी वे आत्मिक जीवन और भौतिक जीवन के बीच सम्बंध नहीं बना पा रहे थे। यह तभी होता है जब हम धर्म की पालना तो करते हैं, उसके रीतिरिवाजों को भी मानते हैं पर परमेश्वर को अपने जीवन का अंतरंग भाग नहीं बना पाते हैं। बाइबल से हमने सीखा था कि हमें दोहरी ज़िन्दगी नहीं जीनी चाहिए बल्कि हमारा जीवन पारदर्शी और परमेश्वर को महिमा देने वाला होना चाहिए।

अगले दिन सुबह हमें परिणाम पता चले और कुल 8 लोग चुने गये थे जिनमें मैं और प्रेरणा भी थे। उसके बाद एक बार हमें साक्षात्कार के लिए बुलाया गया। हमने दुआ की कि हमारे डिपार्टमेंट से कोई भी छांटा न जाए, और अन्ततः 6 ही लोग चुने गए जो सभी हमारे डिपार्टमेंट से ताल्लुक रखते थे।

परमेश्वर ने दुनिया की सोच से परे एक आश्चर्यकर्म हमारे जीवन में किया था। लोग कहते थे कि NIIT (इसरी इंडिया) कम्पनी नहीं आएगी, वो आई। वो कहते थे कि अर्थसाइंस डिपार्टमेंट के छात्रों को नहीं लेगी पर सभी लोग जो चुने गए वो इसी विभाग के थे। और वो कहते थे कि बृजेश और प्रेरणा को नहीं लेगी पर हम दोनों को भी लिया।

बाद में सूचना तकनीकी (IT) में काम करने वाली कई कम्पनियों ने चयनित छात्रों को खेद-पत्र भेज दिए। हमारे साथ के कई लोग भी चिन्तित हुए पर हमने कहा कि परमेश्वर अपनी आशीषों में दुख नहीं मिलाता और ये नौकरी परमेश्वर की आशीष ही थी। सो हमने उन्हें आश्वस्त किया कि परमेश्वर हमें कभी निराश नहीं करता इसलिए कम्पनी खेद-पत्र नहीं भेजेगी। और ऐसा ही हुआ और अन्ततः अपनी पढ़ाई खत्म करने के बाद सितम्बर 2001 में हम सभी ने दिल्ली में नौकरी शुरु की।

इस बात से परमेश्वर ने हमें सिखाया कि हमें अब्राहम कि तरह अनदेखे को विश्वास से देखना और अनगिनत को विश्वास से गिनना सीखना चाहिए। परमेश्वर का धन्यवाद हो।


हेमा की शादी –
निराशा में परमेश्वर से आशा


मैं निरंतर अपने पापा के स्वभाव में परिवर्तन और खास तौर पर उनकी शराब पीने की आदत छूट जाने के लिए रोज प्रार्थना किया करता था। हमारा परिवार उनकी इस आदत के कारण बुरी तरह टूट चुका था।

उन्हीं दिनों में पापा ने हेमा की शादी के लिए एक अच्छा नवयुवक देखा। उनका नाम संजीव है। हेमा ने शादी से पहले उन्हें अपने मसीही विश्वास के बारे में बताया। समय के साथ उन्होंने स्वयं मसीह के प्रेम को चखा और उस पर विश्वास किया। अपने आप में वो काफी नम्र और शांत स्वभाव के पुरूष हैं।

मेरी नज़र में संजीव, हेमा के लिए एकदम सही जोड़ थे। और समय के बीतने के साथ में इस बात से अपने आप में और ज़्यादा सहमत होता चला जा रहा हूँ।

संजीव के परिवार से कुछ गलतफहमी हो जाने के कारण पापा इस सगाई को तोड़ देना चाहते थे। मैं घर से बहुत दूर देहरादून में था और घर पर स्थिति खराब ही थी जैसी मैं छोड़कर गया था। पापा के व्यवहार की बातें सुनकर बहुत दुःखी होता था। कभी कभी मैं अपनी लाचारी पर बहुत रोता था पर एक अच्छी साथी विश्वासी और एक दोस्त की तरह प्रेरणा हमेंशा मुझे ढाढ़स बंधाती थी और विश्वास से मेरे साथ प्रार्थना भी करती थी।

परमेश्वर ने मुझे बुद्धि दी ताकि मैं अपना परियोजना कार्य जल्द पूरा कर सकूँ। मेरे गाइड थोड़ा व्यस्त भी थे फिर भी परमेश्वर की कृपा से मैं अपना 6 महीने का काम 5 महीने में ही खत्म कर घर चला गया कि किसी प्रकार शादी के काम को करा सकूँ।

परमेश्वर ने निराशा के इस समय में भी हमें आशा दी।

हम लोग इस विषय के लिए प्रार्थना कर रहे थे। परमेश्वर ने बड़ी आश्चर्यजनक रीति से इस प्रार्थना का उत्तर दिया। पापा के बहुत पुराने और अंतरंग मित्र जो कि प्रशासनिक सेवा में कार्यरत हैं, समाज में ऊँचा स्थान रखते हैं और संजीव के परिवार से भी परिचित थे, उन्होंने इस बात में हस्तक्षेप किया। उन्होंने कहा कि पापा को इस विवाह को सम्पन्न कराना ही होगा।

पापा यूँ तो अब इस शादी में ज्यादा रूचि नहीं ले रहे थे पर समाज, परिवार और अपने मित्र के दबाव में वो तैयार हो गए थे। परमेश्वर ने बड़ी दया दिखाकर इस विवाह संस्कार को सफल करा दिया। कदम कदम पर परेशानियां आई थीं पर प्रभु यीशु हमारे साथ थे और हमारी हरेक समस्या का निवारण करते जा रहे थे।

आज हेमा शादीशुदा है और उसका एक बेटा (हार्दिक) भी है। संजीव और हेमा, दोनों बपतिस्मा पाए हुए विश्वासी हैं और अपना जीवन परमेश्वर की दया में बिता रहे हैं।


हमारी दूसरी नौकरी –
परमेश्वर के वायदों पर खड़े रहना


परमेश्वर ने बड़ी करूणा दिखाकर हमें (मैं और प्रेरणा) एक ही कम्पनी में पहली नौकरी दी थी और सच में परमेश्वर का हाथ निरंतर हम पर बना रहा था। हम अपने काम और सहकर्मियों के लिए भी दुआ करते थे। वैसे हमारी तरह कई कर्मचारी बहुत मेहनत करते थे परंतु परमेश्वर ने हमारे अधिकारियों के मन में हमारे लिए ऊँचा स्थान बनाया। हमने अपने पेशेवर जीवन में सफलता पाई।

काम के सिलसिले में अप्रैल 2004 में मुझे अमरीका भेजा गया और कई अच्छे प्रोजेक्ट करने का मौका मुझे मिला। अमरीका जाने से पहले मेरा पासपोर्ट खो गया था और जब बहुत ढूंढने पर भी नहीं मिला तो मैं निराश हो चला था। पता नहीं क्यों मैंने प्रार्थना नहीं की, पर प्रेरणा ने प्रार्थना कर उसे ढूंढा और उसी जगह से, जहाँ हम कई बार ढूंढ चुके थे, वो मेरा पासपोर्ट लेकर आ गई। परमेश्वर ने सिखाया कि जीवन की भागदौड़ में और आगे बढ़ने के समय में भी हमें परमेश्वर को नहीं भूल जाना चाहिए।

कम्पनी में मेरा काम सराहनीय रहा और इस के बाद परमेश्वर की दया से मुझे हमारी कम्पनी का बड़ा प्रतिष्ठित पुरस्कार दिया गया। इसी के साथ कम्पनी से मेरी आशाएँ बढ़ गईं थी और मैं अपेक्षा करने लगा था कि नये वित्त वर्ष में मुझे तनख्वाह में अच्छी बढ़ोत्तरी मिलेगी, पर ऐसा नहीं हुआ। मैं समझ गया कि अब समय आ गया कि हमें आगे बढ़ना चाहिए। हमने परमेश्वर से नई नौकरी के लिए प्रार्थना करना शुरू कर दिया।

इसी के साथ यह बताना भी ज़रूरी है कि 2003 में मेरी और प्रेरणा की शादी हो जाने के बाद से, अपने कर्जों को देखते हुए, प्रेरणा ने इन्हीं दिनों में प्रभु से प्रार्थना करना शुरू किया था कि परमेश्वर कैसे भी अपने स्वर्गीय भण्डार से हमारी ज़रूरतें इस प्रकार पूरी करें कि हमारे सारे कर्ज खत्म हो जाएँ।

प्रार्थना करने से पहले भी मैं अपनी अर्जी कई कम्पनियों में भेजता रहता था परंतु वो कभी चुनी ही नहीं जाती थी, पर प्रार्थना करने के बाद कई जगहों से मुझे साक्षात्कार का निमंत्रण मिला। शारजाह की कम्पनी जिसटेक (GISTEC) ने मेरा साक्षात्कार टेलीफोन पर ही ले लिया और कुछ दिनों में मुझे सूचित किया कि वे मुझे नौकरी की पेशकश करना चाहते थे।

मैं नई नौकरी के लिए शारजाह जाने के बारे में सोचने लगा। मैंने योजना बनाई कि पहले मैं जाऊँगा और फिर सब ठीक करने के बाद प्रेरणा को भी बुला लूँगा, लेकिन प्रेरणा इस बात से खुश नहीं थी। वो चाहती थी कि हम साथ ही में शारजाह जाएँ। हम हमेंशा साथ रहे थे और एकाएक ऐसा निर्णय लेना सच में कठिन था।

हमारे विश्वासी भाई और हमारे नज़दीकी मित्र राजकुमार ने भी कहा कि बाइबल में वायदा है कि पति-पत्नी साथ रहेंगे।

“पर सृष्टि के आरम्भ से परमेश्वर ने नर और नारी करके उनको बनाया है। इस कारण मनुष्य अपने माता-पिता से अलग होकर अपनी पत्नी के साथ रहेगा, और वे दोनों एक तन होंगे; इसलिये वे अब दो नहीं पर एक तन हैं। इसलिये जिसे परमेश्वर ने जोड़ा है उसे मनुष्य अलग न करे।”

[मरकुस 10:6-9]

मैं भी इस बात को जानता था पर विश्वास का कदम नहीं उठा पा रहा था। DBF में शनिवार को होने वाली जवानों की सभा में हमने इस बारे में प्रार्थना की। शांति-मार्ग के नाम से जारी राजकुमार भाई और हमारी सेवा में हर इतवार की शाम एक प्रार्थना सभा होती थी जिसमें सभी की ज़रूरतों के लिए दुआ की जाती थी। उसमें हम सभी ने इस विषय पर और प्रार्थना की और हम ये विश्वास करते थे कि (जैसा परमेश्वर के वचन में लिखा है) जहाँ दो या तीन धरती पर एक मन होकर प्रार्थना करते हैं, परमेश्वर स्वर्ग से सुनकर उसका जवाब देता है।

विश्वास का कदम उठाकर मैंने कम्पनी को एक ई-मेल लिखा जिसमें मैंने बताया कि मेरी पत्नी भी बराबर की पढ़ी-लिखी और अनुभवी थी। मैंने पूछा कि क्या वे उसके लिए भी एक नौकरी दे सकते थे। मुझे जवाब मिला कि कम्पनी की नीति (पॉलिसी) के अनुसार वे पति-पत्नी को साथ में नौकरी नहीं दे सकते थे। फिर मैंने इस बाबत उन्हें कोई मेल नहीं लिखा।

हम लगातार प्रार्थना में लगे रहे और प्रेरणा खासतौर पर बड़े बोझ के साथ इस विषय में प्रार्थना कर रही थी। 10-15 दिन बाद मुझे एक ई-मेल मिला जिसमें कम्पनी ने प्रेरणा को नौकरी की पेशकश की थी। प्रभु ने हमारे लिए कम्पनी की पॉलिसी भी बदल दी।

हमने इस प्रस्ताव को स्वीकार किया और जुलाई 2005 में साथ ही शारजाह आए। अभी भी इस कम्पनी में हम ही एकमात्र जोड़ा है जो साथ काम कर रहा है। परमेश्वर का अनुग्रह निरंतर हमारे साथ बना रहता है। प्रभु की स्तुति हो।


शारजाह जाने के रास्ते में –
भरोसा रखना और आज्ञाकारी रहना


जिन्दगी में हमेंशा हमारे पास चुनाव करने का समय आता रहता है। क्या सोचें और क्या नहीं, क्या बोलें और क्या नहीं, क्या करें और क्या नहीं, क्या देखें और क्या नहीं, कहाँ जाएँ और कहाँ नहीं, कैसे प्रतिक्रिया करें और कैसे नहीं आदि।

जब हम जीवित परमेश्वर को जान लेते हैं और उसमें भरोसा रखना शुरू करते हैं तो हमें उसका आज्ञाकारी भी बने रहना चाहिए। हम दिनभर में बहुत से निर्णय लेते हैं। हम उसमें परमेश्वर की आज्ञा का पालन कर सकते हैं या उसका तिरस्कार कर सकते हैं। हम जो भी निर्णय लेते हैं वो परमेश्वर को पूरी तरह मालूम रहता है।

जब हम शारजाह जाने की तैयारी कर रहे थे तो मेरा एकमात्र विदेश-यात्रा का अनुभव वही था जो मैंने थाईलैंड तथा जापान होते हुए अमरीका तक किया था। अपने उसी अनुभव के अनुसार किन किन चीजों की ज़रूरत हमें पड़ सकती है उनका अनुमान लगाकर बहुत सारा सामान हमने जमा लिया। हमारे सामान का कुल वजन 94 किलोग्रम हो गया जबकि हमें सिर्फ 50 किलो ले जाने की ही अनुमति थी।

हमने अपने सामान के लिए भी कुछ इस तरह से प्रार्थना की –

“हे प्रभु, आप जिस देश में हमें ले जा रहे हैं उसके बारे में हमें कुछ भी नहीं मालूम। हम वहाँ किसी को जानते भी नहीं हैं। हम सिर्फ आप पर भरोसा करके वहाँ जा रहे हैं। हमने बहुत सामान ले लिया है, प्रभु हम प्रार्थना करते हैं कि सब अधिकारियों को अपने अधीन कर लीजिए और हमें और हमारे सामान को बिना किसी असुविधा के सुऱक्षित शारजाह पहुँचने में हमारी सहायता कीजिये। आमीन”

हम लोग जहाँ जरूरी हो वहाँ पैसा जमा करने के लिए भी तैयार थे। जब हम अपना बोर्डिंग पास लेने पहुंचे तो वहाँ बैठे कर्मचारी ने कहा कि हमारे सामान का वज़न बहुत ज़्यादा है और हमें करीब करीब 10,000 रुपये जमा करने पड़ेंगे। यह रकम बहुत बड़ी थी, तौभी हम यह देने के लिए तैयार थे। हम लाइन में खड़े हुए मन ही मन प्रार्थना करते रहे।

उसने हमें एक तरफ खड़े होकर प्रतीक्षा करने को कहा। 10 मिनट बाद उसने पूछा कि क्या हम 5000 रुपये दे सकते थे। हमें बड़ा आश्चर्य हुआ पर हमने कहा, “हाँ, पर हमें रसीद चाहिए”। उसने फिर हमें थोड़ी देर खड़े रखा और फिर पूछा कि क्या 2000 रुपये दे सकते थे और हमने फिर वही जवाब दिया।

आखिरकार उसने बिना कुछ पैसे लिये हमें बोर्डिंग पास दे दिया और अन्दर जाने को कहा। हमें नहीं मालूम ये कैसे हुआ पर हम सिर्फ ये जानते हैं कि हमने परमेश्वर के आज्ञाकारी रहकर रिश्वत न देने का निर्णय लिया और प्रभु ने हमारी सहायता की।

जैसे हम आगे बढ़े, एक कस्टम अधिकारी ने हमें रोक लिया और हमारा सामान पहचानने को कहा। हमारे सामान को पहचानने के बाद उसने भी कहा की हमारा सामान काफ़ी भारी था और पूछा कि हमने इसके लिए कितना पैसा चुकाया। हमने साफ साफ बता दिया कि हमने कुछ भी नहीं दिया। इतने पर उसका एक साथी आकर हमें समझाने लगा कि हम उसे कुछ पैसा दे दें अन्यथा वो हमारे सामान को रोक सकता था या भारी जुर्माना लगा सकता था।

हमने बताया कि हम तो पहले भी कानूनन पैसे देने को तैयार थे और अब भी। पिछले कर्मचारी ने हमसे कुछ भुगतान नही लिया यह हमारी गलती नहीं थी। फिर भी वह हमें डराने की कोशिश करता रहा। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि हम क्या करें, तभी प्रभु ने मेरे मन में कुछ बात डाली।
मेरी बाइबल मेरे हाथ में ही थी और मैंने कहा, “भाई, हम तो प्रभु यीशु के विश्वासी हैं और सेवक हैं। प्रभु का वचन यह बाइबल कहती है कि वो सदा हमारे साथ रहता है, तो बताओ कि हम उसके सामने यहाँ आपको रिश्वत कैसे दें?” और इसके बाद हमने उसे बताया और बाइबल से परमेश्वर के वायदे दिखाए कि कैसे परमेश्वर अपने लोगों कि सारी ज़रूरतें पूरा करता है और उनके साथ रहता है और कैसे वो हमारे पापों की क्षमा कर हमें नया जीवन देता है।

तुरंत उस कर्मचारी का मन बदल गया और वो कहने लगा कि मैं भी ऐसा चोरी का काम नहीं करना चाहता। उसने विनती भी की कि हम उसके लिए नई नौकरी के लिए प्रार्थना करें। उसने हमें आश्वासन दिया कि हमारे सामान में कोई दिक्कत नहीं आएगी और हम निश्चिंत होकर जाएँ। हमने उसके लिए दुआ की और हवाईजहाज में चढ़ गए।

हम अपने साज़ो-सामान के साथ सुरक्षित शारजाह पहुँच गए और हमें किसी तरह का अतिरिक्त खर्चा भी नहीं करना पड़ा। यह हमें अज़ीब लग सकता है परंतु परमेश्वर ऐसे कई काम अपने लोगों के साथ करता है।

हमने हरेक परिस्थिति में उस पर भरोसा करना और उसके आज्ञाकारी बने रहना सीखा। हम समझते हैं कि हर दिन के जीवन में हमें परमेश्वर की कितनी ज़रूरत है। हमारे अनुभव के आधार पर मैं आपको आश्वस्त करना चाहता हूँ कि यदि आप परमेश्वर का भय मानें और हर परिस्थिति में उसकी इच्छा के अनुसार निर्णय लें तो परमेश्वर आपको अनगिनत आशीषें देगा।


***

मैं आज भी जब अपना जीवन देखता हूँ तो मैं पाता हूँ कि अपनी सामर्थ्य में मैं आज भी पतित इंसान ही हूँ, और अपने तरीके से यदि मैं मोक्ष की प्राप्ति का प्रयास करता तो ज़रूर नाश ही हो जाता। मैं तो यह भी नहीं कह सकता कि मैं बहुत अच्छा इंसान हूँ, या मैं पवित्र हूँ, पर हाँ, मैं मेरे परमेश्वर पर गर्व ज़रूर करता हूँ कि उसने अपनी दया के कारण मुझ जैसे पतित मनुष्य को पाप के कीचड़ में से निकालकर चट्टान पर ख़डा कर दिया। मेरे पाप के नंगेपन को दूर करने के लिए अपनी जान तक न्यैछावर कर दी कि अपनी पवित्रता मुझको ओढ़ाए और उसने ही मुझे नया मनुष्य बनाया है।

आज मैं जहाँ तक हो सके, रोज़ सुबह और शाम परमेश्वर के साथ समय बिताता हूँ। मैं उसके प्रेम से अभिभूत हो जाता हूँ क्योंकि हर दिन उसकी करूणा मुझपर नई होती है। वो मेरे पापों को क्षमा कर मुझे पवित्र जीवन जीने की प्रेरणा देता है और जब मैं एक बच्चे की तरह गिर जाता हूँ तो भी वो मुझे पिता की तरह उठाता है और अपनी अंगुली पकड़कर मुझे चलना सिखाता है। वो मेरी प्रार्थनाओं का उत्तर करता है।

मैं अभी भी सीख ही रहा हूँ और प्रभु यीशु के बिना मैं कुछ भी नहीं हूँ। मैं अपने आप से कुछ भी नहीं करता परंतु वो जो अब मेरे अंदर रहता है मुझे बुद्धि और सामर्थ देता है कि मैं रोजाना का जीवन जी सकूँ और उसकी महिमा करूँ।

हमारे जीवन में परमेश्वर की विश्वासयोग्यता की और भी बहुत सी गवाहियां हैं पर मैं सबका उल्लेख नहीं करना चाहता, फिर भी आपको उत्साहित करना चाहता हूँ कि यदि आप भी विश्वास करें और प्रार्थना करें तो ऐसा या इससे भी अच्छा जीवन आपका हो सकता है।

अध्याय 9 ::: परमेश्वर की विश्वासयोग्यता

परमेश्वर विश्वासयोग्य और न्यायी है। वो किसी के साथ अन्याय नहीं करता है बल्कि वो तो इस संसार के दबे कुचलों के उत्थान के लिए मानव रूप लेकर दुनिया में आया ताकि उनका उद्धार करे। उसके वचन बड़े प्रभावशाली हैं यहाँ तक कि बाइबल में लिखा है कि स्वर्ग और पृथ्वी तो टल सकते हैं पर परमेश्वर के वचन की एक भी बिंदु या मात्रा पूरे हुए बिना ना टलेगी।

वो अपने वायदों पर सच्चा परमेश्वर है। हम अपने अनिश्चित भविष्य के प्रति भी निश्चिंत होकर अपना जीवन जी सकते हैं क्योंकि परमेश्वर जो आदि से अंत को जानता है वो हमारे साथ है।

“वह अपने वायदों पर खरा परमेश्वर है जो कि उसने अपने वचन में हमसे किये हैं। वह हमसे ऐसी शांति का वायदा करता है जो इस दुनिया में नहीं मिलती। वह अपने वायदे पूरा करता है। वो विश्वासयोग्य परमेश्वर है।”

पिछले पाठ में दी गई सारी बातें परमेश्वर की विश्वासयोग्यता की गवाह हैं। फिर भी मैं कुछ और गवाहियां यहाँ देना चाहता हूँ जिससे आप जान सकें कि परमेश्वर विश्वासयोग्य है और समय उसके लिए कोई कारक नहीं है। विश्वास कीजिए, उसके काम करने का समय एकदम सटीक होता है।

वो प्रार्थना का उत्तर तुरंत दे सकता है या उसमें सालों लगा दे, फिर भी वो जो भी करता है, वो सिद्ध होता है। हम उस पर हरेक परिस्थिति के लिए विश्वास कर सकते हैं।


***

मेरे घराने का उद्धार (मोक्ष)


सन 1998 में, परमेश्वर ने प्रेरितों के काम 16:31 से मुझे एक वायदा किया -

“…प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर, तो तू और तेरा घराना उद्धार पाएगा।”

मैंने परमेश्वर पर विश्वास किया था और मैं उसकी विश्वासयोग्यता को और प्रार्थनाओं के उत्तर देने की क्षमता को जानता था, इसलिए मेरे पास उसपर संदेह करने के लिए कुछ भी नहीं था। मैंने परमेश्वर के इस वायदे को पकड़ लिया और रोज़ इस बारे में दुआ करने लगा।

मैंने 1998 में प्रभु यीशु पर विश्वास किया था और अपना जीवन उनके हाथों में सौंपकर उनका अनुसरण करने लगा था। जब मैं अपने घराने (परिवार) के उद्धार के लिए प्रार्थना करने लगा तो एक एक कर परमेश्वर ने मेरे परिवारजनों को बचाया और उन्हें विश्वास में लिया। मेरे तुरंत बाद ही 1998 में मेरी बहन हेमा ने प्रभु को अपना जीवन दिया।

पंकज, मेरे छोटा भाई पापा के स्वभाव से तंग आकर घर से भागकर सन 2000 में मेरे पास रूड़की आ गया था। प्रेरणा और मैंने उसे परमेश्वर के प्रेम और कृपा के बारे में बताया। हम तीनों साथ में प्रार्थना करने लगे। उसने परमेश्वर की प्रार्थना के उत्तर देने की सामर्थ्य को देखा और विश्वास किया। मैंने उसे बाइबल से दिखाया कि परमेश्वर माफ़ करने के बारे में क्या कहता है और सब बातों को समझकर वो वापस पापा के पास घर चला गया। कुछ बातों में उसका विश्वास ढीला तो पड़ा पर सन 2001 में वो जब से दिल्ली में मेरे साथ रहने लगा, प्रेरणा के समझाने पर और हमारी संगति से वो वापस प्रभु के नज़दीक आ गया।

सन 2001 से मम्मी ने भी थोड़ा थोड़ा विश्वास करना शुरू किया। उनका विश्वास कुछ ढुलमुल सा था, थोड़ा राधास्वामी मत में और थोड़ा प्रभु यीशु में। वो अपनी परिस्थितियों से बौखलाई हुई थी और उन्हें शान्त करने के लिए सब प्रयास करती रहती थी। काफी लम्बे समय तक वो इस असमंजस की स्थिति में रही कि वो किस पर विश्वास करे और किस पर नहीं।

एक प्रश्न उन्हें सालता रहा कि वो कैसे अपने पुराने विश्वास को त्याग कर इस नए मसीही विश्वास में आगे बढ़े। मैंने उन्हें चेताते हुए कहा, “मम्मी, आप दो नावों की सवारी करो यह बात ठीक नहीं है। किसी भी सूरत में ये दोनों बातें एक नहीं है मतलब दोनों नावें एक ही तरफ, एक ही रास्ते से नहीं जा रही हैं। दोनों नावों में एक एक पैर रखने पर, नाव कोई सी भी ठीक हो, पर ऐसा सवार तो पानी में ही जाता है।” मेरे अनुभव को पहचानते हुए और मेरी बात को समझकर उन्होंने ठीक निर्णय ले लिया। उन्होंने समझ लिया कि रास्ते तो बहुत लोग बताते हैं पर सभी सही नहीं हो सकते। परमेश्वर कभी भी दो एकदम भिन्न तथा विरोधाभासी तरीकों से अपने आपको दो मतों में प्रकट नहीं करेगा। यह बात सच है क्योंकि हमारा परमेश्वर संशय और दुविधा में डालने वाला नहीं पर सही मार्ग दिखाने वाला सच्चा, जीवित तथा सिद्ध परमेश्वर है।

मैं प्रभु का धन्यवाद करता हूँ कि मम्मी ने पुरानी सारी बातें छोड़कर प्रभु यीशु को अपना उद्धारकर्ता स्वीकार किया और अपना जीवन प्रभु को दे दिया।

इसके बाद सिर्फ पापा ही बचे थे जिनका जीवन परिवर्तन होना अभी बाकी था। शुरू में अकेले मैं ही अपने परिवार के लिए दुआ किया करता था लेकिन धीरे धीरे परमेश्वर ने मेरे परिवार को बचाया और प्रार्थना में मेरे साथी बढ़ते चले गए और परिवार बदलता चला गया। अब हम सब पापा के मोक्ष के लिए प्रार्थना करते थे।

2003 में मेरी शादी प्रेरणा के साथ हुई जो बहुत अच्छी विश्वासी थी और प्रार्थनाओं में मेरी साथी रही थी।

सन 2004 से पहले तक, मेरे घराने में कई लोगों का उद्धार हो गया। इसी साल में दादाजी हमारे साथ कुछ दिन रहने के लिए आए। उन्होंने हमारा परमेश्वर के लिए प्रेम देखा तो बहुत से सवाल किए जिनका जवाब उनको अपने करीब 40 साल के राधास्वामी सत्संग में जाने से नहीं मिला था। सारे जवाब पाने के बाद, अपने पुराने विचार छोड़कर उन्होंने अपना जीवन प्रभु यीशु को दे दिया।

मेरे और प्रेरणा के कई चचेरे और मौसेरे भाई-बहनों ने, हमारे जीवन को देखकर और हमसे प्रभु के बारे में जानकर, प्रभु यीशु में विश्वास किया। प्रेरणा के ननिहाल में भी कई लोगों ने प्रभु के बारे में सुना और प्रार्थना करने लगे और उसके 72 वर्षीय नाना ने अपना जीवन प्रभु को दे दिया।

हमें आशा है कि एक दिन हम अपने संपूर्ण घराने को प्रभु के विश्वास में देखेंगे ताकि हम सब स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकें और अनंत जीवन परमेश्वर के साथ बिताएँ।


***

पापा का उद्धार


पापा के गर्म स्वभाव और शराब की आदत के बावजूद प्रभु ने हमें उनसे प्यार करते रहने के लिए प्रेरित किया। हम जान चुके थे कि उनका ये स्वभाव उनके अपने कारण से नहीं बल्कि अंधकार की उन शक्तियों के कारण था जो उनका और हमारे परिवार का नाश करना चाहती थी। मुझे पूरा यकीन था कि परमेश्वर पापा को अपने समय में छुड़ाएगा क्योंकि शैतान और उसकी शक्तियों का सिर प्रभु यीशु ने 2000 साल पहले ही कुचल दिया था।

मैं किसी भी तरह से पापा को नीचा दिखाने की कोशिश नहीं कर रहा हूँ, पर जो भी मैंने लिखा है वो सब तथ्य हैं। जो भी हो, मेरे शांति तथा सत्य की खोज के पीछे हमारे घर कि परिस्थितियां ही मुख्य कारण रही, इसलिए मैं हरेक बात के लिए प्रभु का धन्यवाद करता हूँ।

प्रिय पाठक, मैं आपको उत्साहित करना चाहता हूँ कि आप अपने आप को जांच लें। आपके परिजन भी यदि अपनी गवाही लिखें तो आपके बारे मे क्या लिखेंगे? क्या वो आपके स्नेह और प्रेम के बारे में लिखेंगे या उन दुःखों का स्मरण करेंगे जिसमें वे आपके कारण होकर गुजरे?

बहुत से लोग इस दुनिया में ईश्वर को नहीं पाते क्योंकि उनके पास दुनियावी सभी ऐशो-आराम के साधन हैं और उनके जीवन में शायद परेशानियां नहीं है। यह भी कई बार शैतान की एक चाल होती है ताकि इंसान अपनी खुशियों में ही ऐसा डूबा रहे कि ईश्वर की ओर उसका ध्यान ही न जाए।

हम लोग परमेश्वर के वायदे के अनुसार निरंतर अपने घराने के लिए, मुख्यतया पापा के लिए, प्रेरणा की मम्मी और भाइयों के लिए, प्रार्थना कर रहे थे। हमारा विश्वास था कि एक दिन उनका भी उद्धार हो जाएगा। हालांकि शैतान भी शांत तो नहीं बैठता था और अलग अलग परिस्थितियों से हमें हतोत्साहित करने की कोशिश करता रहता था, लेकिन हमारा विश्वास कम होने के बजाय बढ़ता ही गया। हमें जितनी ज्यादा निराशा आती थी, हम उतना ही प्रभु की कृपा में और विश्वास करते थे।

हमारे रिश्तेदारों ने, पापा के दोस्तों ने, मम्मी ने, हम बच्चों ने, सभी ने पापा को शराब पीने की आदत को छोड़ने के लिए कई बार समझाया पर वो किसी की नहीं सुनते थे। मुझे ऐसा लगता है जैसे कि वो इस बात में अपने आप को असहाय महसूस करते थे और कोई शक्ति उन्हें लगातार इस आदत में खींचती जा रही थी।

शराब पीने की अपनी आदत के कारण उनका स्वभाव और स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता जा रहा था। मम्मी इन परिस्थितियों को झेलने में असहज महसूस करने लगी और हमारे पास दिल्ली आ गई।

पापा शराब के ज़हर में घुलते जा रहे थे। डॉक्टरों ने उन्हें मधुमेह (डायबिटीज) होने के बारे में बताया और शराब छोड़ने के लिए कहा। फिर भी मम्मी के जाने के बाद एक महीने तक बिना कुछ ठीक से खाए-पीए वो लगातार शराब पीते रहे जिसके कारण उनकी हालत बहुत बिगड़ गई। उन्हें कई बार अस्पताल में भर्ती किया गया पर ठीक होकर वापस आते ही वो फिर पीना शुरू कर देते थे।

मार्च 2005 में मुझे खबर मिली की उनकी तबियत बहुत खराब थी। मैं जानता था कि वो न तो मेरी सुनेंगे और न ही मम्मी के बिना मुझे वहाँ स्वीकार करेंगे। मम्मी को ऐसी हालत में अकेले भेजना बहुत मुश्किल था। मैं बड़ी अजीब सी स्थिति में था और कुछ सोच नहीं पा रहा था।

उद्धार पाने के बाद से ही मैं, परमेश्वर के प्रेम की जीवित गवाही अपने जीवन से देता रहा और मैंने कभी भी पापा के लिए कड़वाहट नहीं पाली थी तौभी जयपुर जाने की मेरी इच्छा नहीं हो रही थी। उस रात न तो मैं प्रार्थना-सभा में गया और न ही बाइबल स्टडी में। मैं बुरी तरह बेचैन था। मैं घुटनों पर आ गया और प्रभु से प्रार्थना करने लगा ताकि परमेश्वर मेरी अगुवाई करें। परमेश्वर ने तुरंत मुझसे याकूब 2:26 में से बात की -

“अतः जैसे देह आत्मा बिना मरी हुई है, वैसा ही विश्वास भी कर्म बिना मरा हुआ है।”

मैं समझ गया कि परमेश्वर कह रहे थे कि मैं जयपुर जाऊं। मैंने कहा, “हाँ प्रभु, यदि आपकी यही मर्जी है तो मैं जाऊँगा।” मैंने और कुछ जानने की भी कोशिश की पर परमेश्वर ने और कुछ भी नहीं बोला। मैंने तुरंत जयपुर जाने का इरादा बना लिया। पवित्र आत्मा के चलाए मैं अगले दिन निकल पड़ा।

रास्तेभर मुझे अजीब अजीब से ख्याल आते रहे और मैं शैतान को डांटता रहा और प्रार्थना करता रहा। इसी यात्रा के दौरान परमेश्वर ने मुझे एक युवती को जो दिल्ली में प्रशासनिक अधिकारी के तौर पर काम करती थी, को सुसमाचार सुनाने का मौका दिया। यदि हम उसकी मर्जी पर चलें तो कहीं भी वो हमें अपनी इच्छा पूरी करने के लिए और अपनी महिमा के लिए इस्तेमाल करता है।

मैं रात में 10 बजे घर पहुंचा। घर के सारे दरवाज़े खुले हुए थे और अंदर वाले कमरे के अलावा पूरा घर अंधेरे में डूबा हुआ था। सिर्फ उस कमरे में जहां पापा सो रहे थे वहां की बत्ती जल रही थी। वो सच में बहुत ही कमजोर दिख रहे थे, मुझे उनकी हालत पर रोना आ गया। मैं आंसू बहाते हुए उनके पैर दबाने लगा और प्रभु से उनके जीवन परिवर्तन के लिए प्रार्थना करने लगा।

एकाएक वो जाग गये और मुझसे मेरे रोने का कारण पूछने लगे। उनकी बात का जवाब देने के बजाय मैं जोर जोर से रोने लगा। परमेश्वर के पवित्र आत्मा ने मुझे बोलने के लिए शब्द दिए। मैंने बड़े ही सरल शब्दों में परमेश्वर पर विश्वास करने की तथा शराब छोड़ देने की विनती की। पवित्र आत्मा ने उनको छू लिया और उसी समय उन्होंने शराब छोड़ देने का निर्णय लिया।

मुझे तो इस बात पर यकीन ही नहीं हो रहा था क्योंकि हम हज़ारों बार ये विनती उनसे कर चुके थे वो कभी हमारी बात नहीं मानते थे। पर मैं समझ गया कि परमेश्वर ने उनके जीवन में काम किया था।

उनकी हालत बहुत ही खराब दिख रही थी, वो अपने आप पानी का गिलास भी उठाने की स्थिति में नहीं थे, उनके हाथ बुरी तरह कांप रहे थे। उनको शरीर में बहुत दर्द भी हो रहा था। पापा को अपनी इस परेशानी के समय में अपना भूला हुआ राधास्वामी विश्वास याद आया। उन्होंने मुझसे सत्संग की सीडी (CD) चलाने के लिए बोला। मैंने सीडी चला दी और गौर से उसे सुनते हुए पापा के पैर दबाने लगा।

प्रवचन खत्म होने के बाद मैंने अपना निष्कर्ष उनको दिखाया। इस प्रवचन में 90 बार गुरू, 50 के लगभग भजन, 8 के करीब सचखण्ड (स्वर्गीय भवन), और सिर्फ 3-4 बार सतगुरू अथवा मालिक शब्द आया। मेरे इतने सूक्ष्मता से किये विचार से उनके आश्चर्यमिश्रित खुशी हुई क्योंकि उनकी स्वयं की भी ऐसी ही आदत थी।

मैंने उन्हें बताया कि इस मत में गुरू पर सबसे ज्यादा ज़ोर दिया गया है और मालिक पर सबसे कम, जबकि हम सिर्फ अपने प्रभु, अपने परमात्मा से ही सम्बंध बनाने की बातें करते रहते हैं। मेरे इस कथन से वो चकित जरूर हुए।

पापा को लगने लगा था कि वो अब ज़्यादा समय जीवित नहीं रहने वाले थे इसलिये वो मम्मी से मिलने के लिये बेताब थे। मैंने दिल्ली में राजकुमार भाई को फोन किया और पंकज के साथ अपनी कार से जयपुर आने के लिए कहा ताकि पापा को दिल्ली ले जा सकें। वो अगले दिन सुबह जयपुर पहुँच गए। पापा बार बार यही कह रहे थे कि उनका अंत समय आ गया था पर राजकुमार भाई ने उनसे कहा कि यदि वो प्रभु यीशु पर विश्वास करें तो अगले 10 दिनों में वो अपने पैरों पर फिर चल सकते थे। पापा को इस बात का आश्चर्य हो रहा था कि सिर्फ मेरे एक फोन पर मेरे मित्र दिल्ली से जयपुर आ गए। पहली बार उन्होंने मसीही प्रेम देखा था।

दिल्ली पहुँचने के बाद पापा का इलाज शुरू कराया गया। उनका शूगर लेवल बहुत ऊँचा चला गया था और शराब एकाएक बंद कर देने के कारण उनको बहुत बेचैनी भी हो रही थी। वो 2-3 दिन तक सो नहीं सके और बहुत बेचैन होकर उन्होंने मुझे नींद की दवाई लाने के लिए कहा। बहुत ढूंढने पर भी कोई हमें बिना डॉक्टर की सलाह के दवा देने को तैयार नहीं था। उनकी छटपटाहट देख उस दिन हमने मिलकर उनके लिए प्रार्थना की और उस रात उनको बहुत अच्छी नींद आई।

अगले दिन पहली बार उन्होंने खुद स्वीकार किया कि प्रार्थना में शक्ति तो ज़रूर होती है। अब उनको मसीही विश्वास के बारे में और जानने की इच्छा हुई। उन्होंने कई सवाल पूछे और पवित्र आत्मा की अगुवाई से सभी सवालों का मैं भली-भांति जवाब दे सका।

पापा ने पहली बार चर्च जाने की इच्छा ज़ाहिर की। हम लोग DBF (दिल्ली बाइबल फैलोशिप) की हिन्दी सभा में गये जहाँ पास्टर देवेंद्र अगुवाई करते थे। वे बड़े मीठी बोली बोलते हैं और उनके प्रवचन ने पापा को प्रभावित किया। परंतु यहाँ भी शैतान ने तुरुप का इक्का चलाने की कोशिश की। प्रभु-भोज के दौरान उसने पापा के दिमाग में फिर एक उलझन डाली और एक ही बर्तन से दाखरस पीने के कारण उन्हें क्रोध दिलाया। हमने प्रार्थना किया और उन्हें समझाया कि हम एक परिवार हैं और हम में कोई भेदभाव नहीं हैं।

प्रभु ने उनके मन में बात की और वो बाइबल और मसीही विश्वास के पास आने लगे। पास्टर देवेन्द्र और उनकी पत्नी संगीता भी हमारे घर आये और पापा के तथा हम सबके साथ प्रार्थना की।

10 दिनों के बाद, हम सबकी प्रार्थनाओं के फलस्वरूप पापा शराब के सारे दुष्प्रभावों से और सिगरेट तक की आदत से छूट गए थे और उनकी हालत में भी बहुत सुधार आ गया था। उनकी आँखों की रोशनी जो लगभग चली ही गई थी, चश्मे के साथ ठीक हो गई। उनका काँपना खत्म हो गया था और वो स्वयं सुबह की सैर करके आने लगे थे। उन्होंने प्रभु यीशु पर विश्वास किया।

यह मेरे जीवन के सबसे सुखद क्षणों में से एक था। मैं जब उन्हें हिन्दी भजन गाते, बाइबल पढ़ते, प्रार्थना करते और गवाही देते देखता था तो सच में भावविभोर हो जाता था और मेरी आंखों से आंसू बह निकलते थे। उन्होंने सभी से (मित्रों से, रिश्तेदारों से और सहकर्मियों से) अपने नये विश्वास की चर्चा की। उनके जीवन में नया उत्साह आ गया था और वो भरपूरी के उस जीवन का अनुभव करने लगे थे जो प्रभु यीशु मसीह में विश्वास करने से मिलता है।

पापा एक समय ईसाइयत से घृणा करते थे लेकिन बाद में वो मसीह से प्यार करने लगे। कभी उन्होंने मम्मी से कहा था कि अगर वो चर्च गई तो वो तलाक दे देंगे, बाद में वो खुद अपने साथ गाड़ी में बिठाकर उन्हें चर्च लेकर जाते थे। उन्होंने मम्मी के साथ ही बपतिस्मा लिया और परमेश्वर की आज्ञा को पूरा किया। मसीह को पाकर उनका जीवन बदल गया। स्वयं अपनी गवाही में उन्होंने एक असीम शांति का जिक्र कई बार किया। कई लोग उस परिवर्तन की गवाही आज भी दे सकते हैं जो उन्होंने प्रत्यक्ष रूप में पापा के जीवन में देखा था।


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पापा की मृत्यु में परमेश्वर की विश्वासयोग्यता


परमेश्वर हमारी विफलताओं को जानता है। सिर्फ वो ही है जो हमारे पापों को क्षमा भी करता है। न सिर्फ वो हमको माफ करता है बल्कि हमारे सारे अधर्मों को भुला भी देता है। जब हम पश्चाताप के साथ उससे माफी मांगते हैं तो वो यीशु मसीह के लहू से धोकर वो हमें ऐसा बना देता है जैसे हमने कभी पाप किये ही न हों।

अपने आखिरी दिनों में पापा फिर से परीक्षाओं में पड़े और उनकी यही गलतियां उन्हें बहुत भारी पड़ी। अब वो इस दुनिया में नहीं है पर मैं जानता हूँ कि एक दिन हम उनको स्वर्ग में देखेंगे क्योंकि परमेश्वर के वायदे के अनुसार वो अब परमेश्वर के साथ हैं।

मई 2006 में जब मैं शारजाह से जयपुर पहुँचा तो पापा संतोकबा दुर्लभजी अस्पताल में भर्ती थे। वो गहन चिकित्सा कक्ष (ICU) में थे और उनके सारे शरीर पर बहुत से तार, पाइप और यंत्र लगे हुए थे। चिकित्सकों ने बताया कि उनकी हालत बहुत ही खराब थी और उन्हें कोई आशा नज़र नहीं आ रही थी। मैंने फिर भी निर्णय लिया कि चाहे जितना पैसा खर्च हो जाए, अगर आशा की एक भी किरण नज़र आये तो मैं इलाज कराता रहूँगा।

मैंने गहन चिकित्सा कक्ष में अकेले उनके साथ समय व्यतीत किया और उनके लिये प्रार्थना भी की। मैंने उनके लिये वो आत्मिक भजन भी धीमी आवाज में गाया जो उनको विश्वास में आने पर बहुत ही अच्छा लगता था। मैंने उनसे बात की और कहा कि अगर वो मेरी आवाज सुन सकते थे तो वो अपने सभी पापों से पश्चाताप करें और परमेश्वर से क्षमा मांग लें और उन सभी को भी माफ करें जिनके प्रति उनके मन में कोई द्वेष हो।

जब मैं घर वापस गया तो मैं बड़ी दुविधा में था। डाक्टर ने मुझसे कहा था कि मुझे अगले दिन मुझे निर्णय लेना था कि पापा को अस्पताल में और रखा जाए या सब संयंत्र हटा दिये जाएँ। यह मेरे लिये एक बहुत बड़ा प्रश्न था। मुझे मालूम नहीं था कि पापा के बचने की क्या कोई क्षीण सी भी उम्मीद थी या नहीं।

उस रात जब हमने प्रार्थना की तो वो कुछ इस प्रकार थी –

“प्रभु यीशु, हम आपकी सामर्थ पर पूरा भरोसा रखते हैं और जानते हैं कि आप अभी भी आश्चर्यकर्म कर सकते हैं। हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि यदि आपकी इच्छा ये है कि पापा अब आपके साथ चले जाएँ तो होने दें कि डॉक्टर कल हमें कोई आशा न दिखाएँ बल्कि पहली बार में ही यह कहें कि सब खत्म हो चुका है, अन्यथा आप डॉक्टरों की अगुवाई करें ताकि वो पापा का ठीक इलाज कर सकें और पापा ठीक हो जाएँ और आपकी महिमा के लिए जीयें। आमीन”

अगले दिन जब मैं डॉक्टर से मिला तो पहली बात जो उन्होंने की वो ये ही थी कि उनके अनुसार पापा अब मृत थे और कोई आशा नहीं थी। उन्होंने कहा कि हम जब तक चाहें तब तक उन्हें अस्पताल में रख सकते थे पर उससे कोई लाभ नहीं होने वाला था। उनके शरीर में जो सांसें चलती दिख रही थीं वो सिर्फ मशीनों के कारण थी।

डाक्टरों की राय के अनुसार मैंने अपने जीवन का सबसे कठिन निर्णय लिया। सभी यंत्र जो पापा को अब तक चला रहे थे वो हटा दिये गये। मेरे पिता हमें छोड़कर जा चुके थे।

दाह-संस्कार के बाद, मैं फिर एक बार परमेश्वर के पास आया और बातें करने लगा। परमेश्वर ने अपनी करूणा के अनुसार उस समय में भी मुझे सांत्वना दी। सब रिश्तेदारों तो अपने प्रेम के कारण वहाँ आये थे परंतु फिर भी परमेश्वर की सांत्वना उस समय उन सबसे ज्यादा कारगर साबित हुई। परमेश्वर ने यशायाह 57:1,2 से मुझसे बात की –

“धर्मी जन नष्ट होता है, और कोई इस बात की चिन्ता नहीं करता; भक्त मनुष्य उठा लिए जाते हैं, परन्तु कोई नहीं सोचता। धर्मी जन इसलिये उठा लिया गया कि आनेवाली विपत्ति से बच जाए, वह शांति को पहुँचता है; जो सीधी चाल चलता है वह अपनी खाट पर विश्राम करता है।”

मैं सच में अपने मन में सोच ही रहा था कि, मेरे पिता जिनपर यीशु मसीह की पवित्रता ओढ़ाई गई थी, उन्हें इतनी जल्दी ऐसी परिस्थिति में इस दुनिया को छोड़कर क्यों जाना पड़ा। परमेश्वर ने बताया कि वो अपने उद्धार तथा उद्धारकर्ता प्रभु यीशु का तिरस्कार करने के बहुत नज़दीक आ चुके थे इसलिए परमेश्वर ने उन्हें ले लिया ताकि आने वाली विपत्ति से बच जाएँ और उन्हें शांति दी है।


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प्रांजल के जन्म में परमेश्वर की विश्वासयोग्यता


प्रभु यीशु मसीह मृत्यु तथा जन्म दोनों के मालिक हैं। सभी बातों का अधिकार उनके ही हाथों में है। प्रभु यीशु ने क्रूस पर अपने प्राण स्वयं परमेश्वर पिता के हाथों में सौंपे और तीसरे दिन उन्हें वापस भी ले लिया ताकि जीवित होकर अपने लोगों के बीच में फिर से जाएँ। वह जीवित ईश्वर है और आज भी स्वर्ग में विराजमान है।

मैं इस बात को जानता तो था पर पापा की मृत्यु और प्रांजल के जन्म के समय मैंने बड़ी गहराई से इस सत्य को समझा।

प्रभु की दया से हम सबकी प्रार्थनाओं के फलस्वरूप प्रेरणा 2006 के आखिरी महीनों में गर्भवती हुई। उस दिन से हम इसके पूर्णकालिक होने के लिए दुआ करने लगे। प्रभु ने अपने वचन के द्वारा हमें अपनी इच्छा बता दी।

“जैसे वीर के हाथ में तीर, वैसे ही जवानी के लड़के होते हैं।”

[भजनसंहिता 127:4]

यूँ तो हम लड़का या लड़की दोनों ही के लिए बहुत खुशी से तैयार थे परंतु परमेश्वर ने हमें बता दिया कि हमें लड़का होने वाला था। बिना किसी विज्ञान के सिर्फ परमेश्वर पर विश्वास के द्वारा हम ये बात जान गए थे। प्रेरणा ने उसका नाम ‘प्रांजल’ रखने का सुझाव दिया जिसका मतलब ‘सरल’, ‘शुद्ध’ और ‘मनोहर’ होता है। मैं इसके शाब्दिक अर्थ से ज्यादा शब्द-विग्रह से उत्साहित था – प्राण + जल अर्थात जीवन का जल (ख्रीस्त सुसमाचार) पहुंचाने वाला।

जब प्रसव का समय आया तो एक बड़ी समस्या सामने आई। दो दिन इंतजार करने के बाद और दवाईयों से सब प्रकार के यत्न करने के बाद भी प्राकृतिक प्रसव शुरू नहीं हुआ। डॉक्टर ने ऑपरेशन के द्वारा प्रसव कराने की बात की तो मैं इसे पचा नहीं पा रहा था। हम लोग निरंतर प्राकृतिक तरीके के लिए प्रार्थना कर रहे थे।

यह दिन 22 जुलाई 2007 का था। मैंने प्रार्थना करना शुरू किया और परमेश्वर ने मुझसे भजनसंहिता 22 पढ़ने को कहा। मैंने बाइबल खोलकर पढ़ना शुरू किया।

“हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तू ने मुझे क्यों छोड़ दिया? तू मेरी पुकार से और मेरी सहायता करने से क्यों दूर रहता है? मेरा उद्धार कहाँ है? हे मेरे परमेश्वर, मैं दिन को पुकारता हूँ परन्तु तू उत्तर नहीं देता; और रात को भी मैं चुप नहीं रहता।”

यही तो मेरे दिल की पुकार थी। मैं प्रेरणा को प्रसव पीड़ा में देखकर दिन और रात परमेश्वर से प्रार्थना कर रहा था। परमेश्वर ने आगे पढ़ने के लिए कहा (9वीं आयत)।

“परन्तु तू ही ने मुझे गर्भ से निकाला; जब मैं दूधपीता बच्चा था, तब ही से तू ने मुझे भरोसा करना सिखाया है। मैं जन्मते ही तुझी पर छोड़ दिया गया, माता के गर्भ ही से तू मेरी ईश्वर है। मुझ से दूर न हो क्योंकि संकट निकट है, और कोई सहायक नहीं।”

मैंने प्रांजल को परमेश्वर के सामर्थी और दयावन्त हाथों में सौंप दिया था। अपनी विश्वासयोग्यता और दया के अनुसार 30वीं आयत से परमेश्वर ने मुझे शांति दी। उसने कहा -

“एक वंश उसकी सेवा करेगा; और दूसरी पीढी से प्रभु का वर्णन किया जाएगा।”

मुझे मालूम हो गया कि परमेश्वर ने मुझसे बातचीत की है। मैंने कागजों पर हस्ताक्षर करके वापस दे दिये। 9:06 बजे सुबह प्रांजल पैदा हो गया।

बाद में डॉक्टर ने आकर हमसे कहा कि यह बच्चा ईश्वर के चमत्कार के कारण ही प्राकृतिक तरीके से नहीं हुआ क्योंकि एक तो बच्चा भारी था और दूसरे बच्चे की नाल उसके गले में दो बार लिपटी हुई थी जो कि किसी भी दुर्घटना का कारण हो सकती थी। उसने कहा कि कभी कभी ऐसे में गला घुटने से बच्चे की मौत तक भी हो सकती है। उन्होंने हमें मुबारकबाद दी और कहा कि बच्चा बहुत स्वस्थ और अच्छे वजन के साथ पैदा हुआ था।


“और हम जानते हैं, कि जो लोग परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उन के लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती है; अर्थात उन्हीं के लिये जो उस की इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं।”

[रोमियों 8:28]

इस बात से हमने सीखा कि हमें उसमें भरोसा करने की ज़रूरत है क्योंकि वो अपने प्रेम करने वालों और भय मानने वालों के जीवन में भलाई ही लाता है। परमेश्वर की विश्वासयोग्यता की और भी बहुत सी गवाहियां हमारे जीवन में है। कुछ और आशीषों का वर्णन मैं अगले अध्याय में करूंगा।

अध्याय 10 ::: आशीषें

वचन पर ध्यान और मनन के समय में एक बार परमेश्वर ने एक बड़ी महत्वपूर्ण बात मुझे समझाई – हमारे शरीर के वे भाग जो नहीं दिखते वो उनसे ज्यादा महत्व रखते हैं जो कि हमें दिखते हैं।
हम हाथों के, आंखों के, पैरों के और बालों के बिना जीवित रह सकते हैं पर दिल के, गुर्दों के या दिमाग के बिना हमारा जीवित रहना नामुमकिन है।

हम अपनी दुनियावी आशीषों के, जो दिखती हैं, पीछे लगे रहते हैं और बढ़ चढ़कर बताते हैं पर आत्मिक आशीषों को भूल जाते हैं या उनकी धुन में नहीं रहते हैं। सच्चाई ये है कि भौतिक वस्तुएँ अच्छी तो हैं और प्रभु का धन्यवाद करने योग्य भी हैं पर इससे कहीं ज्यादा धन्यवाद के योग्य हमारी वो आशीषें हैं जो अनंतकाल तक हमारे साथ रहेंगी। परमेश्वर सिखाता है कि यदि हम उसकी पवित्रता की और उसके राज्य की खोज करें तो बाकि ये सब वस्तुएँ तो हमें स्वतः ही मिल जाएँगी।

“परमेश्वर अपने भक्तों के लिये बहुत सी आशीषों का वर्णन अपने वचन में करते हैं जिनमें सुख-शांति, प्रेम, सफलता तथा जरूरतों के पूरे होने के साथ ही आत्मिक आशीषें जैसे पाप-क्षमा तथा मोक्ष सम्मिलित हैं।”

कई बार लोग चमत्कार को देखकर प्रभु यीशु पर विश्वास करते हैं या अपनी दुनियावी ज़रूरतों की पूर्ति के लिए उनके पास आते हैं। मैं इस बात पक्षधर नहीं हूँ। मैं मानता हूँ कि परमेश्वर पिता है जिससे प्रेम करने के लिए हमें किसी चमत्कार की आवश्यकता नहीं है। जब हम उसमें विश्वास करने लगते हैं तो आश्चर्यकर्म तो हमारे जीवन का भाग ही बन जाते हैं। हम परमेश्वर पर सिर्फ इसलिए विश्वास नहीं करते कि वो आश्चर्यकर्म करने वाला परमेश्वर है बल्कि इसलिए वो ही हमारा सृष्टिकर्ता परमेश्वर है जो हमें जीवनभर संभालता है और हमें अनंतकाल का सुखमय जीवन देता है।

आप भी उस पर विश्वास करें ताकि आप उससे प्रेम कर सकें और उससे आशीषें पा सकें।

“और हम तो देखी हुई वस्तुओं को नहीं परन्तु अनदेखी वस्तुओं को देखते रहते हैं, क्योंकि देखी हुई वस्तुएँ थोड़े ही दिन की हैं, परन्तु अनदेखी वस्तुएँ सदा बनी रहती हैं।”

[2 कुरिन्थियों 4:18]

बाइबल कई अलग अलग जगहों पर ये बात सिखाती है परंतु मैं इस बात को अपने विश्वासी जीवन में बहुत देर के बाद सीख सका।


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बाइबल में वर्णित आशीषें

ऊपर लिखे महत्वपूर्ण तथ्य को सीखने से पहले, मैं अपने आपको परमेश्वर कि भलाईयों के और उसके प्रेम के बारे में अपने दोस्तों को बताने में बहुत सीमित पाता था, खास तौर पर उन्हें जो कि धनी परिवारों से थे क्योंकि यीशु मसीह पर विश्वास न करने के बावजूद भी उनके पास वो सब दुनियावी चीजें थी जो मैं कहता था कि प्रभु यीशु ने मुझे दी थीं और उन्हें भी दे सकते थे। इस प्रकार प्रभु यीशु का सच्चा सुसमाचार मैं उनको नहीं दे पाता था।

मैं आज ये मानता हूँ कि भौतिक चीजें अच्छी हैं और हमारे जीवन के लिये ज़रूरी भी हैं पर वो महत्वपूर्ण नहीं है। भौतिक वस्तुएं प्रदान करना परमेश्वर के उन सब कामों में से बस एक काम है जो वो अपने लोगों के लिये करता है।

“इसलिये पहले तुम उसके राज्य और धार्मिकता (पवित्रता) की खोज करो तो ये सब वस्तुएँ तुम्हें स्वतः ही मिल जाएँगी।”

[मत्ती 6:33]

परमेश्वर हमें भरपूरी (बाहुल्यता) का जीवन देने का वायदा करता है। प्रभु यीशु इस बहुतायत के जीवन में बहुत सी आशीषों का वर्णन करते हैं जो कि हमें तब तक नहीं मिल सकती जब तक कि हम उनपर विश्वास न करें। परमेश्वर हमारे विश्वास की मात्रा के अनुसार हमें सब भली वस्तुएँ देता है।

यदि परमेश्वर की बताई हुई आशीषों की हम एक सूची बनाएँ तो इसमें पापों की क्षमा, परमेश्वर से जुड़ना, ईश्वर से हमारे अलगाव का समाप्त होना, अनंत जीवन तथा सच्ची खुशी जो कि परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करती इसका एक भाग होंगी। परमेश्वर का पवित्र प्रेम, उसकी शांति, उसकी काबलियत पर विश्वास, हमारे जीने के लिए उसकी कृपा और प्रभु यीशु के नाम से की गई प्रार्थनाओं के उत्तर भी उसी सूची में सम्मिलित होंगी। शारीरिक आशीषें जैसे स्वस्थ शरीर और सब प्रकार की बीमारियों से छुटकारा, हर परिस्थिति में परमेश्वर का साथ, पाप तथा मृत्यु पर विजय, परमेश्वर की पवित्रता का हमको मिलना, हर परीक्षा की घड़ी में एक रास्ता होना, भयानक परिस्थिति में उसका साहस और जीवन के निर्णय लेने के लिये बुद्धि और ज्ञान भी हमें परमेश्वर के वचन में वायदे के रूप में दिये गये हैं।

बाइबल में परमेश्वर की बहुत सी आशीषों का वर्णन है जो कि उनके लिये हैं जो उसके वचन के अनुसार उसके पीछे चलते हैं। भौतिक आशीषें, सफलता, वैभव, आदर, बहुतायत, विजय और परमेश्वर का अनुग्रहकारी साथ उसमें वर्णित हैं। नये नियम में भौतिक आशीषों के साथ आत्मिक आशीषों का भी वर्णन है जैसे – परमेश्वर द्वारा पाप क्षमा कर हमें एक नई सृष्टि बनाना, परमेश्वर की संतान और उसके उतराधिकारी बनना, स्वर्गीय स्थानों तक पहुंच होना, याजकों का समाज होना, सेंतमेंत मोक्ष का दिया जाना, स्वर्ग में प्रवेश का आश्वासन और दण्ड से पार होकर परमेश्वर की छत्रछाया में आ जाना, माँगने वाला नहीं लेकिन परमेश्वर द्वारा देने वाला बनाया जाना, पूँछ नहीं बल्कि सिर ठहराना इत्यादि।

मैं इन सब बातों की आध्यात्मिक विवेचना नहीं करूंगा। मैं आपको सिर्फ यह बताना चाहता हूँ कि परमेश्वर ने यह सब परमेश्वर ने मुझे दिया है।


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परमेश्वर की शांति


मैं आपको कोई झूठी तसल्ली नहीं दूँगा कि प्रभु यीशु को जान लेने के बाद आपके जीवन की सभी परेशानियां खत्म हो जाएँगी या आप फिर कभी पाप नहीं करेंगे। परमेश्वर के पास आना फूलों की सेज के समान नहीं है, पर हाँ, यह ज़रूर कहूँगा कि जब उसके हाथों में हमारे जीवन की बागडोर होती है तो हमारे जीवन में हर परिस्थिति में एक शांति हमारे साथ रहती है जो कि हमें इस दुनिया में नहीं मिलती, और पाप के विरुद्ध हममें एक सामर्थ काम करती है जो हमें सिखाती है कि हम क्या करें और क्या नहीं।

“मैं तुम्हें शान्ति दिए जाता हूँ, अपनी शान्ति तुम्हे देता हूँ; जैसे संसार देता है, मैं तुम्हे नहीं देता, तुम्हारा मन न घबराए और न डरे।”

[युहन्ना 14:27]

“तब परमेश्वर की शान्ति, जो समझ से बिल्कुल परे है, तुम्हारे ह्रदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी।”

[फिलिप्पियों 4:7]

प्रभु यीशु में विश्वास कर लेने के बाद भी एकाएक हमारी सभी मुश्किलें दूर नहीं हो गईं थी, परंतु असीम शांति हमारे जीवन में आ गई जिससे हम हरेक दुःख की घड़ी भी सहजता से पार कर लेते हैं।

सन 2005 से 2006 के बीच का एक ऐसा समय हमारे जीवन में आया जिसमें हमने बहुत आशीषें भी पाईं और दुख भी झेले। अपने बुरे और अच्छे समय में हम परमेश्वर में विश्वास रखे रहे और वो हमें हमारी हरेक कठिन परिस्थिति से छुड़ाता रहा। उसकी शांति निरंतर हमारे जीवन में बनी रही।

अपने उत्तम समय में परमेश्वर ने बड़ी अद्बुत रीति से काम किया। वो पापा को 2005 में विश्वास में लाया और उनको उनकी शराब पीने की बुरी आदत से छुड़ाया। प्रार्थनाओं के द्वारा शारजाह में हमें दूसरी नौकरी मिली और पैसे कि परेशानियाँ भी खत्म होने लगीं।

मैं और मेरी पत्नी प्रेरणा जुलाई 2005 में शारजाह आए। मैं तो नौकरी वीज़ा पर ही था पर वो विज़िट वीज़ा पर आई थी। अक्तूबर में उसे अपना वीज़ा बदलने के लिये ईरान के किशिम द्वीप पर जाना पड़ा। सामान्य परिस्थिति में 1 दिन में जो वीज़ा मिल जाता है उसमें उसे 7 दिन लग गए परंतु इस यात्रा के दौरान भी वो कई लोगों को परमेश्वर के प्रेम के बारे में बताती रही जिसमें कई महिलाओं ने प्रभु यीशु पर विश्वास भी किया। वापस आने के बाद हमें पता चला कि अपनी इस यात्रा के दौरान वह गर्भवती थी और ठीक संभाल न हो पाने के कारण या कमज़ोरी के कारण वह गर्भ संपूर्ण नहीं हो पाया।

हम थोड़े दुखी तो ज़रूर हुए पर निराश नहीं। हमारा परमेश्वर हमें हर परिस्थिति में आशा देता है और हम जानते थे कि अभी भी नियंत्रण में था।

नवम्वर के बाद हमें सुनने को मिला कि पापा अब प्रार्थना में मन नहीं लगाते थे। दिसम्बर के बाद तो उन्होंने चर्च जाना बंद ही कर दिया और शराब पीने की अपनी पुरानी आदत में पड़ने लगे। वो फिर से मम्मी को सताने लगे, इसलिए मम्मी चण्ड़ीगढ़ चली गई जहाँ पंकज फैशन डिज़ाइनिंग का कोर्स कर रहा था।

जनवरी 2006 की एक ठण्डी सुबह जब पंकज और मम्मी चर्च जा रहे थे, तभी मोटरसाइकिल में मम्मी की साड़ी फंस जाने के कारण वो दोनों एक बहुत बड़ी दुर्घटना के शिकार हो गए। पंकज को तो ज्यादा चोट नहीं लगी पर मम्मी का पैर घुटने पर से टूट गया और उनके हाथ और मुँह पर भी चोटें आई। फिर भी मैं परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ कि परमेश्वर ने उनको मौत को मुँह से बचा लिया। पंकज और उसके दोस्तों ने मिलकर मम्मी को अस्पताल पहुँचाया और बहुत सेवा की।

इस दौरान पापा भी वहाँ पहुँचे और उनको वापस जयपुर ले जाने की जिद करने लगे। वो हिल भी नहीं सकती थी और पापा फिर भी उनको 10 घण्टे की यात्रा कराकर जयपुर ले जाने पर अड़े रहे। सबने उनको बहुत समझाया पर वो टस से मस नहीं हुए और वापस जयपुर ले ही गए। इसके कारण प्लास्तर हिल जाने से कुछ परेशानियाँ भी पैदा हो गईं जिनका इलाज जयपुर में कराया गया। वहाँ वो नानाजी के घर में रही। पापा रातबरात फोन कर उनको परेशान करते ही रहते थे। वो ठीक नहीं हो पा रही थीं।

मैं जब यह सुनता तो अपने आपको असहाय पाता था और परमेश्वर से प्रार्थना करता रहता था।

पापा अपने जीवन के सबसे बुरे स्वभाव का प्रदर्शन कर रहे थे। उनके इस स्वभाव से दादाजी का दिमागी संतुलन बिगड़ने लगा और उन्हें कहीं कोई आशा नज़र नहीं आती थी। आखिरकार फरवरी के अंत में वो हमें छोड़कर इस दुनिया से चले गए।

पापा का शराब पीने का क्रम फिर भी नहीं रूका और उनका स्वास्थ्य भी बिगड़ता चला गया। कुछ ही दिनों में उन्हें लीवर की गम्भीर बीमारी हो गई और अगले 2 महीने उन्हें अस्पताल में गुजारने पड़े। मई में वो चल बसे।

उनकी मृत्यु से तुरंत पहले मैं जयपुर पहुँचा, और मृत्योपरांत प्रेरणा को भी जयपुर बुला लिया। अंत्येष्ठी के बाद हम लोग वापस शारजाह आ गये। वापस आने के बाद एक बार फिर हमें पता चला कि प्रेरणा गर्भवती थी परंतु कुछ विषमताओं के कारण यह दूसरा गर्भ भी जुलाई 2006 में चला गया।

नवम्बर 2005 से जुलाई 2006 तक निरंतर हमारे जीवन में कठिन से कठिन परिस्थितियाँ आती रहीं। यह किसी भी सामान्य आदमी को तोड़ने के लिये काफी हैं, परन्तु परमेश्वर हमारे साथ बना रहा और हरेक परिस्थिति में हिम्मत दी। प्रभु ने हमें विश्वास के नये आयाम इस अंतराल में सिखाए। कभी कभी परमेश्वर अपने लोगों के जीवन में ऐसा करता है जिससे कि वो उसमें खिल सकें और उसकी सुगंध इस दुनिया में फैला सकें। यह ऐसा ही है जैसे एक बागवान अपने बगीचे के पौधों की काँट-छाँट करता है ताकि फूल सही तरीके से खिलें और बगीचे की सुंदरता को बढ़ाएँ।

हमारे विश्वास के कारण हमारी दिक्कतें टल नहीं गई परंतु परमेश्वर की शांति हमारे साथ बनी रही।

“मैं ने ये बातें तुमसे इसलिये कही हैं, कि तुम्हे मुझमे शान्ति मिले; संसार में तुम्हे कलेश होता है, परन्तु ढाढस बांधो, मैं ने संसार को जीत लिया है।”

[युहन्ना 16:33]

प्रभु यीशु के उपरोक्त वचन से हमें बहुत ढाढ़स और बल मिलता है कि हर परिस्थिति में उसमें विश्वास करते हुए हम उसके साथ चलते रहें। उसकी शांति हमेंशा हमारे जीवन में बनी रहती है।

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सबके लिए प्रेम

परमेश्वर ने अपना प्रेम मुझपर इस प्रकार प्रकट किया कि जब मैं पाप ही में था तब ही मसीह मेरे लिये मारा गया। उसने क्रूस पर अपने प्रेम की लम्बाई-चौड़ाई-ऊँचाई-गहराई मुझे दिखाई है और फिर स्वयं मुझसे प्रेम दिखाने के बाद उसने मुझसे कहा कि मैं भी वैसा ही प्रेम इस दुनिया में दिखाऊँ। उसने मुझे अपने गुनाहगारों को वैसे ही माफ करना सिखाया है जैसे कि उसने मुझे माफ किया है। मत्ती 9:13 से आगे प्रभु यीशु ने यह बात बड़े अजीब क्रम में बताई हैं कि हम अपने गुनाहगारों को माफ करें ताकि परमेश्वर हमें माफ करे, और यदि हम न करें तो परमेश्वर भी न करे।

मेरे जीवन में ज्यादा लोग ऐसे थे जिनसे मुझे माफी माँगनी थी बजाय उनके जिनको मुझे माफ करना था। मैंने पहले परमेश्वर से और फिर उनसे, जिनसे मुझे माफी माँगनी थी, माफी माँगी। तब से लेकर अब मैं हर दिन अपनी रोजाना की गलतियों से पश्चाताप कर परमेश्वर के योग्य जीवन बिताता हूँ।

परमेश्वर ने मुझे अपने प्यार और करुणा से भर दिया है, खास तौर पर उनके लिये जो भटके हुए हैं। यह परमेश्वर का ‘अगापे’ प्रेम है जो मुझे निरंतर उनके लिये प्रार्थना करने के लिये और सुसमाचार बताने के लिये प्रेरित करता है। मैं इस बात की डींग नहीं मार सकता कि मैं सबसे प्रेम करता हूँ। मैं कोशिश करता हूँ और कई बार इसमें विफल भी हो जाता हूँ। फिर भी जब मैं अपने आपको परमेश्वर के हाथों में सौंप देता हूँ तो वो मुझ में रहकर सब से प्यार करता है।

प्रभु यीशु को अपना व्यक्तिगत उद्धारकर्ता जान लेने के बाद से मैं एक बदला हुआ इंसान हो गया हूँ। मैं अपने परिवार से और ज्यादा प्यार करने लगा हूँ और उनकी ओर ज्यादा ज़िम्मेदार हो गया हूँ। मेरे भाई-बहन ने मुझमें यह अंतर देखा है, और शायद यह ही मेरे परिवार को मसीह से प्रभावित करने का कारण रहा हो। परमेश्वर ने सारी कड़वाहट को मेरे जीवन से निकालकर अपनी मिठास मुझ में भर दी।

बाइबल प्रेम के बारे में बहुत कुछ सिखाती है –

“प्रेम धीरजवन्त है, और कृपाल है; प्रेम ईर्ष्या नहीं करता; प्रेम अपनी बड़ाई नहीं करता, और फूलता नहीं। वह अनरीति नहीं चलता, वह अपनी भलाई नहीं चाहता, झुंझलाता नहीं, बुरा नहीं मानता। कुकर्म से आनन्दित नहीं होता, परन्तु सत्य से आनन्दित होता है। वह सब बातें सह लेता है, सब बातों पर विश्वास करता है, सब बातों की आशा रखता है, सब बातों में धीरज धरता है। प्रेम कभी टलता नहीं...”

[1 कुरिन्थियों 13:4-8]

“पलटा न लेना, और न अपने जाति भाइयों से बैर रखना, परन्तु एक दूसरे से अपने समान प्रेम रखना; मैं यहोवा (परमेश्वर) हूँ।”

[लैव्यव्यवस्था 19:18]

“तुम सुन चुके हो, कि कहा गया था; कि अपने पड़ोसी से प्रेम रखना, और अपने बैरी से बैर। परंतु मैं तुम से यह कहता हूँ, कि अपने बैरियों से प्रेम रखो और अपने सतानेवालों के लिये प्रार्थना करो।”

[मत्ती 5:43, 44]

“उस ने उत्तर दिया, कि तू प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी शक्ति और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख; और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।”

[लूका 10:27]

हमें ऐसा लग सकता है कि ये बातें कहना आसान है पर करना मुश्किल - और यह बात सही भी है जब हम अपनी सामर्थ में ऐसा करने की कोशिश करते हैं। परंतु जब हम अपने आपको परमेश्वर की आधीनता में ऐसा करते हैं तो परमेश्वर कृपा करता है और निरंतर सिखाता है।

वो हमसे यह अपेक्षा रखता है कि हम अपनी ओर से नम्रता और दीनता का व्यवहार करते हुए उसके जैसा स्वभाव बनाएँ (गलतियों 2:5), और परमेश्वर के उसी स्वरूप में परिवर्तित होते चले जाएँ जैसा उसने शुरू में हमें आदम और हव्वा करके (उत्पत्ति 1:27) बनाया।

मैं बाइबल में सिखाया गया सिद्ध प्रेम नहीं कर पाता हूँ। मैं अभी भी सीख रहा हूँ। पर मेरा विश्वास है कि जो भला काम परमेश्वर ने शुरू किया है वो उसे खत्म भी करेगा।

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विचारों में बदलाव (नकारात्मक से सकारात्मक)


मेरी सोच बदल गई है। परमेश्वर ने अपने वचन से सिखाया कि हर वो विचार जो परमेश्वर की ओर से नहीं है उन्हें बंदी कर हम प्रभु के चरणों में ले आएँ ताकि वो हम पर प्रभुता न कर सके, क्योंकि ऐसे विचार जो परमेश्वर की ओर से नहीं, वह शैतान की ओर से हैं।

प्रभु यीशु को जानने से पहले जब भी किसी युवक को मैं देखता तो मेरे मन में लड़ने के विचार उठते थे। मैं सोचता कि यदि में इस व्यक्ति से लड़ूँ तो इसे पीट सकूँगा या ये मुझे पछाड़ देगा। मैं युक्तियाँ बनाने लगता था कि मैं इसे इस तरीके से पटकूँगा या इसे ऐसे हरा सकूँगा। मेरा अपने ही विचारों पर कोई नियंत्रण नहीं था या शायद मेरी विचारधारा ही ऐसी हो चली थी। मेरे विचार प्रेम के या भाईचारे के नहीं परन्तु लड़ाई के थे।

जब मैंने प्रभु यीशु को जाना तो मैंने सीखा कि वो तो हमें अपना दूसरा गाल उसकी ओर फेरना सिखाते हैं जिसनें हमारे एक गाल पर तमाचा मारा हो, और उनके लिये प्रार्थना करना सिखाते हैं जो हमें सताते हों। प्रभु कहते हैं कि बदला लेना हमारा नहीं उनका काम हैं, हमें तो प्रेम में सब सह लेना है।

परमेश्वर की लालसा इसी बात की रहती है कि वो आत्माओं को नर्क से बचाएँ, और उसने मुझ में भी वो इच्छा पैदा कर दी है। आज जब मैं किसी को देखता हूँ तो उसके प्रति द्वेष या लड़ाई की भावना पैदा नहीं होती बल्कि मुझे उसमें एक भटकी और खोई हुई आत्मा दिखाई पड़ती है जो शायद नर्क की ओर जा रही हो। मेरा हृदय द्रवित हो जाता है और मैं अपने आपको उनके प्रति जिम्मेदार महसूस करता हूँ।

पहले वो समय था जब मेरे पास कोई आशा नहीं थी और मैं हर बात में नकारात्मक पहलू देखा करता था। अपनी जीवन नैया मैं खुद ही खेने की कोशिश करता रहता था और सच बताऊं तो बहुत मशक्कत करनी पड़ती थी। यह आपका अनुभव भी हो सकता है। जीवन में कई बार हम ऐसी परिस्थिति में पड़ जाते हैं कि हमें हाथ को हाथ नहीं सूझ पड़ता है। हमें पता नहीं चलता कि इसका परिणाम क्या होगा और हमारे मन में स्वाभाविक तौर पर नकारात्मक विचार आने शुरू हो जाते हैं।

जबसे मैंने प्रभु यीशु को पा लिया है तबसे मेरी जीवन नैया के खेवनहार वो ही है और मैं आराम से रह सकता हूँ क्योंकि मैं जानता हूँ कि उन्हें सब मालूम है। वो सब कुछ सही करते हैं। अपने जीवन की उन कठिन परिस्थितियों को, जिनमें पहले हम हारा हुआ महसूस करते थे, उनमें परमेश्वर हमें विजय दिलाता है और उन्हें हमारे आधीनता में ले आता है।

बाइबल बताती है कि उसने हमें स्वर्ग कि कु़ञ्जियाँ दे दी है ताकि जो भी हम धरती पर बाँधें वो स्वर्ग में बंध जाये और जो भी हम धरती पर खोलें वो स्वर्ग में खुल जाए। हमारे मुख से निकलने वाले शब्द ही वो कुंजी है। हमारे मुख से निकले हर शब्द का बड़ा महत्व है। हमारे सकारात्मक शब्द परमेश्वर इस्तेमाल करता है कि हमें आशीष दे और नकारात्मक शब्द शैतान इस्तेमाल करता है कि हमें नाश करे। यह समझने के तुरंत बाद मैंने अपने नकारात्मक शब्दों के लिये परमेश्वर से क्षमा माँगी और उनके प्रभाव को यीशु के पवित्र नाम में खत्म किया। अब मैं सकारात्मक बोता हूँ और सकारात्मक काटता हूँ।

मेरे विचार अब सकारात्मक हैं। किसी परिस्थिति में मैं अब नकारात्मक बातें नहीं ढूंढता बल्कि हर बात में परमेश्वर को खोजता हूँ, और पाता भी हूँ इसलिये मेरे पास हमेंशा आशा रहती है और मैं हरेक बात में उसका धन्यवाद कर पाता हूँ। मेरे जीवन में यह परिवर्तन प्रभु की दया और सामर्थ से हुआ है, मैं उनका आभारी हूँ।


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मौत का भय नहीं रहा


मौत का भय अब मुझमें नहीं है।

पौलुस फिलिप्पियों 1:21 में यह बात कहता है कि उसके लिये जीना मसीह है और मरना लाभ। हर बात में वो परमेश्वर को अपने साथ महसूस करता था और इसीलिये न तो उसे अपने शारीरिक जीवन से कुछ विशेष प्रेम था और न मृत्यु से कुछ भय।

इस दुनिया में ज़्यादातर लोग मौत से भय खाते हैं। इसके पीछे मुख्य कारण ये है कि उन्हें यह नहीं मालूम कि मरने के बाद हमारा क्या होता है। हमारी आत्मा कहाँ जाती है? भविष्य कि अनिश्चितता ही भय को लाती है।

मुझे मालूम है कि मृत्यु के बाद मेरा क्या होगा। मुझे मृत्यु से कोई भय नहीं है। युहन्ना 14:3 के अनुसार यीशु का वायदा मेरे साथ है –

“और यदि मैं जाकर तुम्हारे लिये जगह तैयार करूँ, तो फिर आकर तुम्हे अपने यहाँ ले जाऊँगा, कि जहाँ मैं रहूं वहाँ तुम भी रहो।”

दूसरा कारक जिसके कारण लोग मृत्यु से डरते हैं वो है – मेरे बाद मेरे परिवार का क्या होगा, मेरी पत्नी, मेरे बच्चे, मेरे माता-पिता। प्रभु यीशु में मेरे पास एक आशा है क्योंकि वो मेरी सुधि लेते हैं। मैं जानता हूँ कि जो परमेश्वर मेरी ज़रूरतें पूरा करता है वो मेरे परिवार की भी ज़रूरतें पूरी कर सकता है।

प्रभु यीशु ने मत्ती 6:26, 27 में कहा है -

“आकाश के पक्षियों को देखो। वे न बोते हैं, न काटते हैं, और न खत्तों में बटोरते हैं; तौभी तुम्हारा स्वर्गीय पिता उन को खिलाता है; क्या तुम उन से अधिक मूल्य नहीं रखते। तुम में कौन है, जो चिन्ता करके अपनी अवस्था में एक घड़ी भी बढ़ा सकता है?”

और मत्ती 6:31, 32 में –

“इसलिये तुम चिन्ता करके यह न कहना, कि हम क्या खाएँगे, या क्या पीएँगे, या क्या पहिनेंगे? क्योंकि अन्यजाति इन सब वस्तुओं की खोज में रहते हैं, और तुम्हारी स्वर्गीय पिता जानता है, कि तुम्हे ये सब वस्तुएँ चाहिए।”

मैं अपने जीवन से संतुष्ट हूँ और प्रतिदिन परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ। मैं मृत्यु को किसी भी दिन देखने में नहीं डरता क्योंकि फिर मैं प्रभु यीशु के साथ स्वर्ग में रहूँगा।

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परमेश्वर के साथ सनातन जीवन की आशा


बाइबल बताती है कि वो जो परमेश्वर के पुत्र यीशु मसीह में विश्वास करते हैं वे परमेश्वर की लेपालक (गोद ली हुई) संतान है। उनका नाम जीवन की किताब में लिखा है और उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं है बल्कि वे न्याय के दिन खरे पाये जाएँगे।

प्रभु के इस वचन पर विश्वास करने के मेरे पास ठोस कारण हैं। यीशु मसीह के बारे में की गई करीब 332 भविष्यवाणियों में से 99 प्रतिशत भविष्यवाणियाँ बिल्कुल ठीक ठीक पूरी हुई हैं, और जो बची हैं वो सिर्फ उनके दूसरे आगमन के विषय में हैं। मैं जानता हूँ कि जब पहले आगमन कि भविष्यवाणियाँ शत-प्रतिशत पूरी हुई हैं तो दूसरे आगमन के विषय में भी पूरी होंगी। और वैसे भी यदि मेरा जीवन परिवर्तन सत्य है तो मैं क्योंकर संदेह करूँ।

यीशु मसीह फिर से आने वाले हैं ताकि अपनी कलीसिया (चर्च) को अपने साथ स्वर्ग में ले जाएँ जहाँ उसने सब विश्वासियों के लिये स्थान तैयार किये हैं। वहाँ हम उसके सारे स्वर्गदूतों, सारी जातियों के विश्वासियों, देश देश के लोगों और मसीही संतों के साथ उसकी आराधना करेंगे और चारों ओर उसकी महिमा का प्रकाश होगा।

मुझे आशा है कि मैं परमेश्वर को देखूँगा और उसके साथ उसके राज्य में रहूँगा। परमेश्वर के पवित्र स्वर्ग का स्पष्ट चित्रण बाइबल की आखिरी पुस्तक ‘प्रकाशितवाक्य’ में दिया गया है।

यह एक आत्मिक आशीष है जो अदृश्य है जिसे हम अपनी शारीरिक आँखों से नहीं देख सकते पर यह हमें दी गई है ताकि प्रभु के दूसरे आगमन में इसे पूरा होते देखें। जो विश्वास करेंगे वो इसके भागीदार होंगे बाकि पीछे छूट जाएँगे।

ऐसा क्या है जो मुझे उस महिमा की आशा रखने से रोक सके?


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सफलता और समृद्धि

बाइबल की एक पुस्तक भजनसंहिता के पहले अध्याय में सफल पुरूष की एक परिभाषा दी गई है –

“क्या ही धन्य है वह पुरुष जो दुष्टों की युक्ति पर नहीं चलता, और न पापियों के मार्ग में खड़ा होता; और न ठट्ठा करनेवालों की मण्डली में बैठता है। परन्तु वह तो यहोवा की व्यवस्था से प्रसन्न रहता; और उसकी व्यवस्था पर रात दिन ध्यान करता रहता है। वह उस वृक्ष के समान है, जो बहती नालियों के किनारे लगाया गया है। और अपनी ऋतु में फलता है, और जिसके पत्ते मुरझाते नहीं। इसलिये जो कुछ वह पुरुष करे वह सफल होता है।”

इसे मैं ऐसे भी कह सकता हूँ कि वह व्यक्ति (स्त्री अथवा पुरुष) जो दुष्टों की मण्डली में न तो उठता बैठता है और न उनके विचारों तथा योजनाओं में किसी प्रकार भागी होता है बल्कि वह निरंतर परमेश्वर का भय मानते हुए दिन रात उसके वचन पर मनन कर पाप से परे आज्ञाकारिता का जीवन बिताता है, और अपने जीवन में परमेश्वर को सबसे मुख्य स्थान देता है वह व्यक्ति अपने हरेक काम में सफल होता है।

मैंने जब उपरोक्त वचन का अध्ययन किया और इसे समझने के बाद इसका पालन करने लगा तो परमेश्वर ने मुझे अपार सफलता दी है। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि मैं एक सन्त बन गया हूँ या पापरहित हो गया हूँ और न ही यह कि मैं दुनिया का सबसे सफ़ल व्यक्ति हूँ। बल्कि मैं यह बताने की कोशिश कर रहा हूँ कि मैंने अपनी सारी बुद्धि, बल तथा ह्रदय से परमेश्वर से प्रेम किया और उसके वचन को महत्व दिया, और ऐसा जीवन जीने का सतक प्रयास किया जैसा परमेश्वर चाहता है तो परमेश्वर ने मेरी मदद की। प्रभु यीशु ने असफलताओं को मेरे जीवन से गायब कर दिया है। जैसा मैंने पहले कई गवाहियों में बताया है कि हर परिस्थिति को ठीक से संभालने में परमेश्वर ने मेरी बड़ी सहायता की है। पवित्र आत्मा मेरी पढ़ाई से लेकर नौकरी तक और दैनिक जीवन से लेकर सामाजिक बातों में निरंतर मेरी अगुवाई करता रहा है।

ऐसा नहीं है कि मैं बहुत धनी हो गया हूँ पर आज मेरे पास परमेश्वर की दी हुई वो सब भौतिक चीजें हैं जो इस दुनिया में जीने के लिये हमें आवश्यक हैं। जो भी मेरे चीजें मेरे पास हैं उनके लिये मैं परमेश्वर का धन्यवाद कर उनको प्रयोग करता रहता हूँ। वे मेरे लिये काम की तो हैं पर महत्वपूर्ण नहीं है। मैं उनमें घमण्ड नहीं करता बल्कि अपने परमेश्वर में घमण्ड करता हूँ जो मुझे वो सब भली वस्तुएँ देता है। मैं अपने परमेश्वर से निरंतर प्रेम करता रहूँगा चाहे इस दुनिया की वस्तुएँ मेरे पास रहे या न रहे।

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परमेश्वर से मित्रता


परमेश्वर की कृपादृष्टि निरंतर मुझ पर और मेरे परिवार पर बनी रही है। यह सच में एक आत्मिक आशीष है जिसके कारण सारी भौतिक और शारीरिक आशीषें भी मेरे जीवन में आई हैं।

परमेश्वर हमारा मित्र बना है, और सच कहूँ तो वो मेरा सबसे प्यारा दोस्त है। वो मेरी सब बातें सह लेता है, कभी शिकायत नहीं करता, मेरी गलतियों को माफ करता है और अपना साथ मुझे देता है। मैं जब मुश्किल बात में फँस जाता हूँ तो वो मेरी सहायता करता है। वो मुझसे रोज मिलता है और बहुत बातें करना चाहता है।

परमेश्वर से मित्रता करना मुश्किल नहीं है। हमें सिर्फ इतना करने भर की ज़रूरत है कि हम उसे जानें, उसकी मित्रता का प्रस्ताव स्वीकार करें और हर दिन उसके साथ संगति करें।

मैं जानता हूँ कि हमारे ऐसा करने पर वो हमारे अंदर रहने लगता है। वो चाहता है कि हम अपने हरेक चुनाव में और हरेक निर्णय में उसको सम्मिलित करें। वो चाहता है कि हम प्रार्थना में उसके पास जाएँ और उससे परामर्श लें। उसकी इच्छा रहती है कि हम उसको अपने जीवन के हर क्षण में प्राथमिकता दें और उसको पहचानें।

यदि हम उसको अपने जीवन का एक अभिन्न अंग बना लें तो हम उसकी मित्रता और उसके अनुग्रह का अहसास कर सकते हैं।


परमेश्वर से मित्रता की गवाही

शारजाह आने के बाद हमारे पास कोई कम्प्यूटर नहीं था जिससे हम इंटरनेट पर भारत में अपने परिजनों से चैट कर सकें। अतः हम एक कम्प्यूटर खरीदना चाहते थे। हम प्रार्थना करने लगे। पैसा हमारी प्रार्थना का विषय नहीं था क्योंकि हमारे पास आवश्यक रूपये थे। हम प्रभु से राय लेना चाहते थे कि हम कैसा कम्प्यूटर खरीदें। यह बात उन लोगों को हास्यास्पद लग सकती है जो परमेश्वर को जीवित या अपना मित्र नहीं समझते।

अन्ततः कई दिनों की प्रार्थना के बाद हमें विश्वास हो गया कि परमेश्वर हमें लैपटॉप खरीदने देना चाहता था। हम पहला मौका मिलते ही जाकर एक लैपटॉप खरीद कर ले आये।

लैपटॉप आने के बाद हमें एक माउस, हैडफोन, इंटरनेट तार तथा वैबकैम की आवश्यकता थी। यह सब चीजें कुल मिलाकर 100 दिरहम (अमीराती मुद्रा 1 दिरहम = 11+ भारतीय रुपया) में आनी थीं।

एक शाम को शारजाह के सिटी सेंटर में जाकर हमने एक बड़ी दुकान में सब सामान चुन लिया और पैसे चुकाने काउंटर पर पहुँचे। वहाँ आने पर ही हमें पता चला कि जिस हैडफोन को हम 36 दिरहम का समझ कर ले आये थे वो असल में 52 दिरहम का था। शायद किसी ने उसे गलत जगह पर रख दिया होगा यह सोचकर हम फिर भी उसे खरीद लाए क्योंकि वो हमें पसंद आ गया था। हमने अपने बजट से ज्यादा मूल्य चुकाया।

घर पहुँचने के बाद मैंने सबसे पहले माउस का पैकेट खोला। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि पैकेट पर USB लिखा था जबकि यह माउस PS2 तरह का था जो कि मेरे कम्प्यूटर में काम नहीं आ सकता था। इसके बाद मैंने बड़ी आशाओं के साथ वैबकैम का पैकेट खोला तो पाया कि इसकी ड्राइवर सीडी टूटी हुई थी। आखिर में इंटरनेट केबल को इस्तेमाल करने की कोशिश की तो इसमें भी मुझे असफलता ही मिली। ये केबल इंटरनेट के लिये नहीं थी।

इस प्रकार हम उनमें से कोई भी वस्तु इस्तेमाल नहीं कर सके।

हम इस बारे में विचार करने लगे कि ऐसा क्यों हुआ। हम दोनों (प्रेरणा और मैं) आखिर एक निष्कर्ष पर पहुँचे कि हमने यीशु मसीह से इस बाबत कोई बात नहीं की। जब हम 5000 दिरहम खर्च करने जा रहे थे तो हम निरंतर प्रार्थना कर रहे थे परंतु जब 100-150 दिरहम खर्च करने की बात आई तो हम अपने परममित्र से सलाह लेना भूल गये। यह हमें छोटी बात लग रही थी पर प्रभु ने सिखाया कि यह छोटी बात नहीं थी।

हमने प्रभु से माफी माँगी और अपनी गलती स्वीकार की। इसके बाद हमने गिदौन की तरह एक बड़ी अनोखी बात प्रभु से कही। हमने कहा कि यदि प्रभु ने हमें माफ कर दिया तो हमें इन चीजों का पैसा वापस दिला दें। अनोखी इसलिये क्योंकि यह दुकान इस बात के लिये प्रसिद्ध है कि इसमें वे पैसा वापस नहीं देते बल्कि एक वाउचर देते हैं जिससे ग्राहक उसी दुकान में अन्य चीजों की खरीददारी कर सकें।

इस प्रार्थना के बाद हम उस दुकान के शिकायत काउंटर पर पहुँचे। उन्होंने अपने नियमों के अनुसार हमें वाउचर देने की बात कही, और हमें प्रतीक्षा करने के लिये कहा। कुछ समय के बाद उनके मुख्य क्लर्क के न आने पर उन्होंने हमें हमारा पैसा वापस कर दिया। यह सामान्य बात नहीं थी पर हम जानते थे कि ये क्यों हुआ।

हमें मालूम हो गया कि हमारे मित्र ने हमें क्षमा कर दिया था।

हमने इस बात से सीखा कि प्रभु यीशु हमारे उनके साथ संबंध को कितना महत्व देते थे। हम अब निरंतर प्रभु के साथ रहना पसंद करते हैं और उनको अपने जीवन में प्राथमिक स्थान देते हैं और उनका विशेष साथ निरंतर हमारे संग बना रहता है।


***

परमेश्वर का विशेष साथ

परमेश्वर के विशेष साथ को हम नीचे दिये गये उदाहरण से समझ सकते हैं।

एक ऐसी सड़क की कल्पना कीजिये जिसमें बाकी सब लोग तो भीड़ भरी लेन में धीरे धीरे रेंगते हुए से चल रहे हों पर उसी समय कुछ विशेष लोगों के लिये एक अत्यधिक तेज रफ्तार वाली लेन निर्धारित हो जो बिना किसी परेशानी के 150 किलोमीटर प्रतिघंटा या ज्यादा की रफ्तार से जा रहे हों। यह अजीब लग सकता है और शायद किसी को बुरा भी लगे परन्तु परमेश्वर का अनुग्रह जिसपर हो वो बिना रुकावट के निरंतर अपनी जीवन यात्रा में सफल और संतुष्ट जीवन का आनन्द उठाते हैं। परमेश्वर न तो किसी को बाध्य करता है कि धीमी लेन में चलें और न ही किसी भी कारण से किसी को उससे विशेषाधिकार पाने से प्रतिबंधित किया है कि तेज लेन में न चल सकें। जो इस विशेषाधिकार से वंचित हैं यह परमेश्वर की नहीं अपितु स्वयं उनकी ही गलती है। परमेश्वर पक्षपाती नहीं है।

उपरोक्त उदाहरण से मैं प्रभु यीशु के संकरे और चौड़े मार्ग के बारे में दी गई शिक्षा को तोड़ने मरोड़ने की कोशिश नहीं कर रहा हूँ। उस पद में प्रभु ने जो शिक्षा दी है वह इस प्रकार है कि संकरा मार्ग परमेश्वर की ओर लेकर जाता है जिसपर चलना मुश्किल है क्योंकि यहाँ अपने शरीर को मारते कूटते हुए हमें पवित्र जीवन जीवन जीना होता है; पर उस पर भीड़ कम है। इसके विपरीत नर्क की ओर जाने वाला मार्ग बहुत चौड़ा है और इस पर चलना आसान है, क्योंकि इसमें पाप और शैतान के दास रहते हुए हम स्वच्छंदता का जीवन बिताते रहते हैं, परन्तु इस पर भीड़ बहुत है और लोग एक दूसरे को दबाते हुए आगे बढ़ते रहते हैं।

हम परमेश्वर के इस विशेष साथ को कैसे पा सकते हैं, यह समझने के लिये फिर से हमें एक दृष्टांत को देखना होगा।

विचार कीजिये कि आप एक बहुत महंगा उपकरण खरीद कर लाये जिसमें सैंकड़ों बिजली के तार लगाने की जगह है और आप इसे संगठित करने बैठे हैं। हर अच्छी कम्पनी के उपकरण की तरह इसके साथ भी एक निर्देश पुस्तिका आई है जो हरेक तार को कहाँ जोड़ना है इस विषय में निर्देश देती है। यदि आप उस निर्देश-पुस्तिका के आधार पर सब कुछ जोड़ें तो ज़रूर अपने उपकरण को चलने योग्य बना लेंगे और उसका भरपूर इस्तेमाल कर सकेंगे। परन्तु यदि आप इस पुस्तिका को एक तरफ रखकर अपनी समझ के अनुसार सब तारों को जोड़ने का प्रयास करेंगे तो संभव है कि आप इसमें कोई ऐसी गलती कर बैठें जिससे सारा उपकरण ही जलकर खाक हो जाए।

ठीक उसी प्रकार हमारा जीवन भी काफी जटिल है और बहुत सी पेचीदा परिस्थितियाँ हमारे सामने रोज आती हैं जिनका हमें सही निर्णय लेना ज़रूरी है अन्यथा हम बहुत बड़ी परेशानी में फंस सकते हैं (पाप और मृत्यु के जाल में फंसे भी हुए हैं)। हमारे निर्माता ने हमारे जीवन के लिये भी एक निर्देश पुस्तिका दी है जिसका नाम बाइबल है। यदि अपने जीवन को हम अपने तरीके से चलाते हैं तो बहुत बार हानि उठाते हैं परंतु यदि हम, हमें दी गई निर्देश-पुस्तिका के अनुसार जीवन बिताएँ तो परमेश्वर का विशेष साथ हमें निरंतर मिलता है।

***

परमेश्वर ने अपने वचन में लिखा हरेक वायदा मेरे जीवन में पूरा किया है। मैं कई बार विश्वासहीन और अयोग्य बन गया पर वो मुझसे निरंतर प्रेम करता रहा।

आपके लिये भी ऐसा ही करने के लिये वो तत्पर है। आप अपने पुराने सारे पूर्वाग्रहों को आज छोड़ दें और विश्वास करें कि वो परमेश्वर का पुत्र मसीह है जो आपके पापों की कीमत चुकाने इस धरती पर इंसान बनकर आया, आपके खातिर मारा गया, गाड़ा गया और फिर जी उठा और जीवित स्वर्ग में उठा लिया गया। उसको अपने जीवन में स्थान दें और उसकी अगुवाई में जीवन व्यतीत करें।

चाहे आप पहले से विश्वास करते रहे हों या आपने अभी अभी प्रभु यीशु को अपनाने का निर्णय लिया हो, संभव है कि अब तक आप भरपूर जीवन खो रहे हों, पर आज और अभी से ही आप इसे पा सकते हैं। यदि आप परमेश्वर के साथ एक निर्णय करना चाहते हैं तो मेरे साथ प्रार्थना करें :

“प्रिय प्रभु यीशु, मैं सच में आपका आभारी हूँ कि आपने मुझे बताया है कि आप मुझसे प्रेम करते हैं। स्वामी, आपने अपने वचन में बहुत सी आशीषों का वर्णन किया है और मैं उनको पाना चाहता हूँ। मैं जान गया हूँ कि मैं पापी हूँ और आप पवित्र परमेश्वर हैं। मैं अपने पापी जीवन से पछताता हूँ और अपने पापों से मन फिराता हूँ। मुझे क्षमा कर दीजिए। मेरे जीवन में आइये और अपना पवित्र आत्मा मुझे दीजिए ताकि आज के बाद का जीवन में आपका आज्ञाकारी शिष्य बनकर जी सकूँ। आमीन।”

अध्याय 11 ::: ईश्वरीय जीवन कैसे जीयें

मैं यहाँ आपको संक्षिप्त विवरण दे देता हूँ कि हम अब तक चलकर कहाँ तक आ पहुँचे हैं।


आओ


हमने पहली सीमा पार की जब हमने देखा कि परमेश्वर हमें आने के लिये बुलाहट देता है।


परमेश्वर ने हरेक आत्मा को बुलावा दिया है कि आएँ, उसे जानें और शांति तथा विश्वास का जीवन उसके साथ जीयें। बाइबल कहती है जब तक हम उसकी आवाज सुनकर उसके पीछे नहीं जाते तब तक हम उसके साथ बैर रखते हैं। एक भेड़ को अपने चरवाहे की आवाज़ को सुनना और पहचानना ज़रूरी है ताकि उसके पीछे चलकर सही गंतव्य तक पहुँच सके। जब तक हम परमेश्वर के अधीन नहीं आते तब तक हम शैतान के अधीन रहते हैं और नाश की ओर बढ़ते रहते हैं।


पाओ


दूसरी सीमा हमने पार की जिसमें हमने देखा कि हम परमेश्वर से कैसी कैसी आत्मिक और भौतिक आशीषें पा सकते हैं।


प्रभु यीशु ने हमारे उद्धार का काम एक ही बार मानव रूप लेकर अपने प्राणों से हमारे पापों की कीमत चुकाकर कर दिया है। हम इस उद्धार को विश्वास के द्वारा पा सकते हैं। अपने मोक्ष की प्राप्ति के लिये हमें विश्वास के अलावा किसी भी और वस्तु की आवश्यकता नहीं है।


परमेश्वर हमें वैसे ही ग्रहण करता है जैसे हम हैं। वो हमें पहले अपना जीवन बदलने, आदतें बदलने, धार्मिक बन जाने या अच्छे कर्म करने के लिये नहीं बाध्य करता है। वो परमेश्वर है और हमारी उसके पवित्र मापदण्डों को पूरा न कर पाने अक्षमताओं को जानता है, इसलिये हमें हमारे निरर्थक कामों में कुण्ठित होने देने के बजाय हमारी जीवन की समस्याओं का हल वो स्वयं हमें देता है।


जाओ


इसके बाद बड़े संक्षेप में मैं आपको यह बताना चाहता हूँ कि परमेश्वर हमें किस प्रकार का जीवन जीने के लिये इस दुनिया में भेजता है। हो सकता है कि इस पुस्तक को पढ़ने से पहले से आप प्रभु यीशु को जानते हों या इस पुस्तक के पढ़ने के बाद आपने उनको अपने जीवन का स्वामी बनाया हो, पर संभवतया आप वैसा जीवन नहीं जी रहे थे जैसी हमारी बुलाहट है।


हमें क्या करना चाहिए – हमें प्रभु यीशु ख्रीस्त जैसा जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए और परमेश्वर की समानता में निरंतर बदलते जाना चाहिए। इसके बाद यह कि हम ‘जायें’ और इस दुनिया में परमेश्वर की ज्योति को फैलाएँ। अपने व्यवहार तथा आचरण के द्वारा उसका स्वरूप दिखाएँ।


ईश्वरीय जीवन जीने के लिये हमारे दैनिक जीवन में हमें निम्न बातों का समावेश करना ज़रूरी है। उसके अलावा बहुत सी और भी बातें हैं जो वचन से, प्रार्थना से, मनन से और पवित्र आत्मा की अगुवाई से हम सीखते हैं मैं यहाँ नहीं लिख रहा हूँ। फिर भी निम्न बातों से आप शुरूआत कर सकते हैं:

  • परमेश्वर से बात करें
  • रोज़ प्रार्थना करें आत्मा को भोजन दें
  • हर दिन बाइबल पढ़ें विश्वास में जड़ पकड़ें
  • हमेंशा संगति में रहें प्रेम बाँटें
  • अपने विश्वास की गवाही दें


***


हर दिन प्रार्थना


प्रार्थना करना और कुछ नहीं अपितु परमपिता परमेश्वर से बातचीत करना है। उसे अपना अंतरंग मित्र, प्रेमी पिता, सर्वज्ञानी गुरू तथा सृष्टिकर्ता ईश्वर समझते हुए व्यक्तिगत तौर पर उससे बातचीत करना ही सच्ची प्रार्थना है।


प्रभु यीशु ने स्वयं अपने जीवन से हमें दिखाया कि कैसे वो हर रात और सुबह जल्दी ही प्रार्थना के लिये सुनसान स्थानों में चले जाते थे ताकि अकेले में परमेश्वर से वार्तालाप कर सकें। इंसान के रूप में रहते हुए वह अपने ईश्वरीय शक्तियों का उपयोग नहीं करते थे परंतु पिता की संगति के कारण वे बड़े बड़े चमत्कार कर देते थे।


क्या वो परमेश्वर से कुछ पाने के लिये प्रार्थना करते थे ? नहीं।


परंतु अपने प्रेम के कारण वो परमेश्वर से मिलने के लिये रोज प्रार्थना में समय बिताया करते थे। हम भी यदि प्रार्थना में समय व्यतीत करें तो हम भी न सिर्फ वो सब कर सकते हैं जो प्रभु यीशु ने मानव रूप में किया बल्कि उससे भी बड़े बड़े काम कर सकते हैं, ऐसा स्वयं प्रभु यीशु का कहना है। प्रार्थनाओं में बड़े बड़े चमत्कार करने की शक्ति है।


प्रार्थना करना सिर्फ हमारा निर्णय नहीं है अपितु यह परमेश्वर की हमारे लिये इच्छा है।


“निरंतर प्रार्थना में लगे रहो। हर बात में धन्यवाद करो; क्योंकि तुम्हारे लिये मसीह यीशु में परमेश्वर की यही इच्छा है।”

[1 थिस्सलुनीकियों 5:17, 18]


हमें परमेश्वर को पिता की तरह देखकर उसका पवित्र भय मानने की ज़रूरत है, उसको स्वामी की तरह देखकर उसके आज्ञाकारी दास बनने की ज़रूरत है, प्रभु देखकर उसकी आराधना करने की ज़रूरत है, सच्चा साथी देखकर निरंतर उसमें भरोसा रखने की ज़रूरत है। वो अलग अलग रूप में निरंतर हमारे साथ रहता है बस हमें उससे बात करने की आवश्यकता है।


हमें एकांत में परमेश्वर के पास जाने की जरूरत है ताकि उसकी सामर्थ और उसकी उपस्थिति का आनंद उठा सकें। हो सके तो मैं अपना हर दिन प्रभु के साथ बातचीत कर शुरू करता हूँ और रात में उसका धन्यवाद करके खत्म करता हूँ। दिन में हर समय उसको देखता हूँ और उसकी उपस्थिति का अहसास करता रहता हूँ।


मेरा मानना है कि सुबह उठकर इस दुनिया से बात करने से पहले हमें परमेश्वर से बात करने की आवश्यकता है। कई लोग अखबार पढ़कर अपना दिन शुरू करते हैं तो कुछ और सुबह के व्यायाम से। इनमें से कुछ भी गलत नहीं है पर मेरे विचार में परमेश्वर को पहला स्थान देने के बाद ये सब काम करना बेहतर है। इसके बाद, पूरे दिन संभालने के लिये हर रात उसका धन्यवाद करना ज़रूरी है। रोज ही हम किसी न किसी प्रकार कुछ बातें ऐसी कर देते हैं जो परमेश्वर को पसंद नहीं है, अपनी ऐसी गलतियों की क्षमा हर रोज़ मांगना भी निहायत ज़रूरी है।


जब हम प्रार्थना करते हैं तो परमेश्वर हमें शांति, प्रेम और आनंद देता है। वो हमारी हर आवश्यकता की पूर्ति करता है और हर परेशानी से हमें छुड़ाता है। वो ही आत्माओं को शैतान के चंगुल से छुड़ाता है। हम इस बात के लिये अपने परिवार और अपने जानने वालों के लिये निरंतर दुआ कर सकते हैं।


***


हर दिन बाइबल अध्ययन


प्रभु यीशु ने कहा –


“यदि तुम मुझ में बने रहो और मेरी वचन तुम में बना रहे, तो जो चाहो माँगो और वह तुम्हारे लिये हो जाएगा।”

[युहन्ना 15:7]


यह बात मैंने अपने विश्वासी जीवन की शुरूआत से सीखी। मुझे बताया गया था कि परमेश्वर का वचन (बाइबल) हमारी आत्मा का भोजन है।


सामान्यतया हम अपने शरीर की अभिलाषाओं को पूरा करके उसे काफी भोजन देते हैं, लेकिन अपनी आत्मा को भोजन नहीं देते हैं।


यदि हम अपने शरीर को तो भोजन दें पर आत्मा को नहीं तो फिर शरीर तो मज़बूत होता चला जाता है परंतु आत्मा क्षीण होती चली जाती है। और फिर यदि कभी आत्मा और शरीर में किसी परीक्षा की घड़ी में द्वंद होता है तो यह बात बहुत आसानी से समझ में आनी चाहिए कि क्यों आत्मा हार जाती है और परमेश्वर के विरुद्ध हम पाप कर बैठते हैं।

कमज़ोर आत्मा परीक्षा में खड़ी नहीं रह पाती और पाप में गिर जाती है।


कई बार हम बाइबल पर आधारित बहुत सी किताबें तो पढ़ते हैं जो कि प्रसिद्ध लेखकों और प्रचारकों के द्वारा लिखी गई हैं और जो बाइबल के ही बारे में सिखाती हैं पर बाइबल को नहीं पढ़ते हैं। यह ऐसा है जैसे कि खाना न खाना, परंतु खाने के बारे में ऐसी किताबें पढ़ना जो अच्छे रसोईयों के द्वारी लिखी गई हों। क्या खाना खाये बिना तृप्ति मिल सकती है?


मैं इस बारे में आपको सचेत करना चाहता हूँ। मैं आपको सलाह दूँगा कि आप बाइबल पढ़ने को अपने जीवन का एक अंतरंग भाग बना लें। अपने आप को हमें शुरू में थोड़ा अनुशासित करना पड़ता है लेकिन धीरे धीरे यह हमारे स्वभाव में आ जाता है और हमें इसके लिये कोई अतिरिक्त मेहनत नहीं करनी पड़ती है। हमें परमेश्वर के वचन में जड़े जमानी बहुत ज़रूरी है ताकि हम विश्वास में बढ़ते चले जाएँ। हमारा यही विश्वास हमारी ढाल बन जाता है कि हम शैतान की सारी परीक्षाओं का सामना आसानी से कर सकें।


***


विश्वास में जड़ पकड़ना


रोमियों 10:17 में बाइबल इस प्रकार कहती है –


“अतः विश्वास सुनने से और सुनना मसीह के वचन से होता है।”


जैसे बाइबल पढ़कर हम परमेश्वर की आवाज को सुन सकते हैं, जो कि बहुत महत्वपूर्ण भी है, उसी प्रकार उन लोगों से परमेश्वर के वचन के द्वारा सुनना जो कि विश्वास में मज़बूत हो चुके हैं, आवश्यक है ताकि विश्वास के सिद्धान्तों को हम और गहराई से समझ सकें और विश्वास में मज़बूत होते चले जाएँ।
इसी कारण परमेश्वर हमसे चाहता है कि हम एक पवित्र आत्मा से भरी हुई कलीसिया (चर्च) में जाकर हफ्ते दर हफ्ते (या हो सके तो ज्यादा भी) संगति करें।


और एक दूसरे के साथ इकट्ठा होना ना छोड़ें, जैसे कि कितनों की रीति है, पर एक दूसरे को समझाते रहें; और ज्यों ज्यों उस दिन को निकट आते देखो त्यों त्यों और भी अधिक यह किया करो।

[इब्रानियों 10:25]


हम चर्च इसलिये नहीं जाते कि वहाँ हमें ईश्वर मिलेगा, क्योंकि वो तो हमारे निमंत्रण पर हमारे जीवन में ही आ चुका है। परमेश्वर किसी भी आराधना के स्थान में नहीं रहता बल्कि वो तो सर्वव्यापी परमेश्वर है। चर्च में तो हम साथी विश्वासियों की गवाहियाँ सुनते हैं, प्रवचन सुनते हैं ताकि बाइबल की गूढ़ बातें सीख सकें। वहाँ हम साथी विश्वासियों के साथ मिलकर परमेश्वर की आराधना करते हैं। वहाँ हम एक दूसरे से बात कर एक दूसरे को उत्साहित करते हैं और प्रार्थना भी करते हैं।


जैसे हम अपने शरीर की माँसपेशियाँ बनाने के लिये कसरत करते हैं, ठीक उसी प्रकार हमें अपनी आत्मा को मज़बूत करने के लिये विश्वास की कसरत करनी ज़रूरी है।


कुलुस्सियों 2:6, 7 में लिखा है -


“अतः जैसे तुम ने मसीह यीशु को प्रभु करके ग्रहण कर लिया है; वैसे ही उसी में चलते रहो, और उसी में जड़ पकड़ते और बढ़ते जाओ; और जैसे तुम सिखाए गए वैसे ही विश्वास में दृढ़ होते जाओ, और अधिकाधिक धन्यवाद करते रहो।”


***


उसके प्रेम का प्रचार करना


बाइबल बताती है कि यीशु मसीह इस दुनिया का न्याय करने के लिये जल्द आने वाले हैं। विचार कीजिये – आपको तो परमेश्वर के प्रेम का सुसमाचार मिल गया और शायद आपने विश्वास कर भी लिया या अब कर लेंगे, मगर आपके परिवार और अन्य प्रियजनों का क्या होगा, उनको कौन यह रास्ता बताएगा, वो अपना अनन्त जीवन कहाँ बितायेंगे?


मैं आपके परिवार को नहीं जानता। शायद कोई पास्टर भी वहाँ नहीं पहुंच सके, पर आप तो हैं। क्या आप नहीं चाहेंगे कि वे भी मोक्ष पाएँ और स्वर्ग में प्रवेश करने की आशा उनको भी मिल जाए?
हमारा हमारे परिवार, दोस्तों, सहकर्मियों (या सहपाठियों) और हमारे समाज के दबे कुचले लोगों के प्रति प्रेम क्या हमें दुहाई नहीं देता कि हम स्वयं उन तक यह बात पहुँचायें?


बाइबल हमारा आह्वान करती है कि हम परमेश्वर के मोक्ष के विशाल कार्य में सहभागी हो जाएँ ताकि आत्माओं को विनाश की कगार से खींचकर जीवन की ओर ले आयें।


इसी उद्देश्य को लेकर प्रभु यीशु हमारे बीच में इंसान बनकर आये जैसा कि लूका रचित सुसमाचार में (लूका 19:10) लिखा भी है -


“क्योंकि मनुष्य का पुत्र खोए हुओं को ढूंढने और उन का उद्धार करने आया है।”


फिर युहन्ना 20:21 में प्रभु यीशु ने फिर सिखाया –


“यीशु ने फिर उन से कहा, तुम्हे शान्ति मिले; जैसे पिता ने मुझे भेजा है, वैसे ही मैं भी तुम्हे भेजता हूँ।”


और मत्ती 28:19, 20 में वायदा किया -


“इसलिये तुम जाकर सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ और उन्हें पिता और पुत्र और पवित्रआत्मा के नाम से बपतिस्मा दो। और उन्हें सब बातें जो में ने तुम्हे आज्ञा दी है, मानना सिखाओ; और देखो, मैं जगत के अन्त तक सदैव तुम्हारे संग हूँ।”


प्रभु यीशु ने हमें आश्वासन दिया है कि स्वर्ग और पृथ्वी पर सारा अधिकार उनका है और फिर हमें आज्ञा दी है कि हम जाकर उसके प्रेम का सुसमाचार सभी लोगों को बतायें और अपने चरित्र और जीवन से उसका स्वरूप दिखायें।


बाइबल बताती है कि यह सुसमाचार हम अपनी सामर्थ्य में नहीं सुनाते बल्कि यह परमेश्वर का उद्देश्य है और वही इसमें हमारी सहायता करता है -


“परन्तु जब पवित्र आत्मा तुम पर आएगा तब तुम सामर्थ पाओगे; और यरूशलेम और सारे यहूदिया और सामरिया में, और पृथ्वी के छोर तक मेरे गवाह होगे।”

[प्रेरितों के काम 1:8]


प्रभु यीशु ने चेले बनाने की आज्ञा दी है धर्म परिवर्तन कराने की नहीं। उसने सच्चे मसीही विश्वास का प्रचार करने और उसका सच्चा प्रतिबिंब अपने जीवन से दिखाने के लिये हमें कहा है। बाकि काम वो स्वयं करेगा कि अपने खोजने वालों को मिले और उनकी आत्मिक प्यास बुझाए। हमें तो सिर्फ उसके आज्ञाकारी बने रहने की आवश्यकता है।


***


प्रभु यीशु मसीह में विश्वास कर लेने के बाद मैंने अपने चारों ओर देखा तो पाया कि कितने ही लोग श्रापित जीवन जी रहे थे और भटकते हुए सनातन जीवन का मार्ग खोज रहे थे। मैंने सोच लिया कि मुझे उनको दिखाना है कि परमेश्वर जिसने मेरा जीवन परिवर्तन किया वो उनसे भी प्रेम करता था और उनका जीवन भी आशीषों से भर सकता था। मैं अपने नये विश्वास के बारे में सभी को बताने लगा था। मेरे पास बाइबल का ज्ञान नहीं था पर मैं सिर्फ अपने प्रेम, विश्वास तथा अनुभवों की ही गवाही देता था।
जब हम अपने आप को परमेश्वर को दे देते हैं तो वो हमारे द्वारा बड़े आश्चर्यचकित कर देने वाले काम करता है। मैं रह रहकर अपने आपको बताता रहता हूँ कि मैं तो मिट्टी ही था, परमेश्वर ने मुझे अपने काम का बर्तन बनाया है और जैसे वो चाहे इसे इस्तेमाल कर सकता है क्योंकि उसने अपने प्राणों की कीमत चुकाकर मुझे खरीद लिया है। यह बर्तन की नहीं परंतु उसके बनाने वाले और इस्तेमाल करने वाले के गुण हैं जिनकी प्रशंसा हो, क्योंकि वही महत्वपूर्ण है।


मैं यहाँ एक उदाहरण देकर बताना चाहता हूँ कि परमेश्वर किस प्रकार हमें जहाँ भी हम हों, हमें अपनी महिमा के लिये इस्तेमाल करता है, और बदले में हमें ही आशीष भी दे सकता है। आप ये भी देखेंगे कि सुसमाचार बताकर किसी को मसीह के प्रेम में लाने के लिये हमें समय देने, धैर्य रखने और विश्वास के साथ पवित्र प्रेम दिखाने की आवश्यकता पड़ती है।


***


गवाहियों द्वारा उद्धार

(उदाहरण – प्रेरणा का उद्धार)


सन 1998-99 में, रूड़की में अपनी पढ़ाई के दौरान, मुझे मौका मिला कि अपनी एक सहपाठिन के साथ मैं प्रभु के प्यार की खुशखबरी बाँट सका। उसका नाम प्रेरणा है। वो बौद्ध परिवार से सम्बंध रखती थी। यूँ तो बौद्ध धर्म के मानने वाले मध्यम मार्ग पर चलते हुए निर्वाण प्राप्त करने में विश्वास करते हैं और मूर्ति-पूजा नहीं करते लेकिन वो मन्दिर में पूजा भी किया करती थी और व्रत भी रखती थी।


मेरा जीवन सिद्ध (परफेक्ट) नहीं था और न ही मैं इस बात का इंतज़ार कर सकता था, बस मैंने स्पष्ट रीति से अपना विश्वास और उद्धार की परमेश्वर की योजना के बारे में उसे बताया।


मेरी हरेक बात को वो बड़े धैर्य के साथ सुनती थी पर सही मायने में किसी बात पर विश्वास नहीं करती थी। वो मेरे विश्वास की कद्र करती थी पर उसमें खुद विश्वास करने की उसकी कोई इच्छा नहीं होती थी। उसकी सोच थी कि यीशु मसीह ईसाईयों के ईश्वर हैं जैसे कि उसके अपने कई भगवान थे और हम सबको अपने अपने तरीके से ईश्वर की आराधना करने की स्वतंत्रता है।


वो ये भी सोचती थी कि यीशु अन्य सभी ईश्वरों में से एक ईश्वर थे और मानती थी कि चाहे उसे किसी भी नाम से पुकारा जाए, राम, अल्लाह या यीशु, बात एक ही है। मैं नाम के विषय में तो बहस नहीं करता था परंतु मेरी प्रार्थनाओं के उत्तर मिलने की गवाही से और प्रभु के निरंतर मेरे साथ होने के अलग अहसास से मैंने उसे अंतर दिखाया। मैंने उसे बताया कि ईश्वर एक ही है और हम अपने बनाये तरीकों से उस तक नहीं पहुँच सकते अपितु प्रभु यीशु ही एकमात्र मार्ग है जिनके द्वारा उस तक पहुँचा जा सकता है क्योंकि सिर्फ यीशु मसीह ने ही हमारे पापों की कीमत चुकाई है।


मैंने उसे बताया कि ये धर्म की बात नहीं थी बल्कि परमेश्वर की बात थी। यहाँ तक कि प्रभु यीशु भी धर्म में रूचि नहीं लेते थे जबकि उनका जन्म यहूदी परिवार में हुआ था। बल्कि वो उन पाखण्डी धर्मगुरूओं के तरीकों का खण्डन करते थे जो कहते कुछ और थे और करते कुछ और।
मैं हॉस्टल में उसके लिये प्रार्थना किया करता था।


मेरी बातों की तुलना में, वह परमेश्वर में मेरी अटूट आस्था से प्रभावित होती थी थी और सोचती थी कि कैसे मेरी प्रार्थनाओं के उत्तर मिलते थे। उसने भी एक बार बिना मुझे बताये यीशु मसीह के नाम से प्रार्थना की और उसे तुरंत उत्तर मिले और उसे पता चल गया कि प्रभु यीशु प्रार्थनाओं के उत्तर देने वाले ईश्वर है। और भी कुछ ऐसी घटनाएँ हुईं जिनसे उसे विश्वास हो गया कि यीशु मसीह परमेश्वर का पुत्र है और स्वयं परमेश्वर है।


हम लोग हर रोज रात 8 बजे मिलकर मेरी गिडियन बाइबल से पढ़ने लगे और साथ साथ में विश्वास में बढ़ने लगे।


सितम्बर 2000 में उसने पानी का बपतिस्मा लेकर अपने विश्वास तथा जीवन परिवर्तन की गवाही दी और पुराने तौर-तरीके छोड़कर प्रभु यीशु को विश्वास के द्वारा अपने जीवन का स्वामी करके स्वीकार किया।


आज वो आत्मा में नया जन्म पाई हुई प्रभु यीशु की विश्वासी है जो अपने ह्रदय, बुद्धि और बल से परमेश्वर से प्रेम करती है। अब वो मेरी पत्नी है और मैं प्रभु का धन्यवाद करता हूँ कि परमेश्वर की दया से हम एक अच्छा, संतुलित मसीही परिवार बन सके हैं जिससे कई लोगों को प्रेरणा मिलती है।


***


प्रेरणा और मै मसीही विश्वास में साथ साथ बढ़े। ऊपर लिखे सारे सिद्धांत हमने साथ ही सीखे और अपने जीवन में लागू किये। परमेश्वर हमेंशा हमारे साथ दयावंत रहा है और अपनी विश्वासयोग्यता के अनुसार हमारे जीवन में आश्चर्यकर्म (चमत्कार) करता रहा है तथा अपनी महिमा हर प्रकार से उसने हमारे जीवन में प्रकट की है। उसने हमें सिखाया कि कैसे हम उसकी नजर से सभी बातों को देख सकें और सही निर्णय ले सकें।


हमारे घर का यह अलिखित नियम है कि हमारे घर में आने वाला हरेक व्यक्ति सुसमाचार सुनकर ही बाहर जाए। चाहे वह व्यक्ति हमारा सहकर्मी हो, रिश्तेदार हो, दूधवाला हो, पानी पहुँचाने वाला, सफाईवाला, अख़बारवाला, सफाईवाली महरी या पासपोर्ट पूछताछ के लिए आया पुलिसवाला, हमने सबको अपना प्रेम दिखाया और परमेश्वर का मार्ग बताया। हम सोचते हैं कि उनमें से कईयों को (जो विश्वास करेंगे) हम स्वर्ग में देख पायेंगे।


हमने अपने घराने में भी आत्मा के उद्धार का सुसमाचार पहुँचाया है और मसीह के प्रेम के बारे में बताने में हम कभी शरमाते नहीं हैं। कुछ तो विश्वास करने लगे हैं और कुछ अभी मशक्कत कर रहे हैं कि इसपर विश्वास कर सकें। कुछ बेअसर हैं तो कुछ विरोध में, पर हम आश्वस्त हैं कि परमेश्वर अपनी करूणा में सबको स्वर्ग के राज्य के लिए तैयार करेंगे। हम निरंतर प्रार्थना करते हैं और अपनी जीवन की गवाहियां बताते रहते हैं।


हम अपना काम करें और वो अपना करेगा। हमारा परमेश्वर महान है और सब बातों में सामर्थी है। परमेश्वर हमारी प्रतीक्षा कर रहा है। हमने सेंतमेंत (मुफ्त में) पाया है तो आइये, हम सेंतमेंत दें भी।